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अरे ये क्या किया आपने, वक्त ज़रूरत के लिए एक ज़मीन थी वो भी बेच दी कल को बेटी की शादी करनी है और रिटायरमेंट के बाद के लिए कुछ सोचा है । एक सहारा था वह भी चला गया ।
अरे भाग्यवान, बेटी के इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमिशन के लिए ही तो बेचा है, और बुढ़ापे का सहारा ये ज़मीन जायजाद नहीं हमारे बच्चे हैं और उनकी तरबियत की जिम्मेदारी हमारी है । रही बात शादी की तो, न लड़की की शादी में दहेज़ देंगे, न लड़के की शादी में दहेज़ लेंगे
हिसाब बराबर है, न लेना एक न देना दो ।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on December 3, 2015 at 12:10pm

न लड़की की शादी में दहेज़ देंगे, न लड़के की शादी में दहेज़ लेंगे
हिसाब बराबर है, न लेना एक न देना दो ।---  इसी  आदर्श  संकल्प के साथ सुंदर कहनी का पताक्षेत करने  के लियें बधाई श्री नादिर खान जी 

Comment by नादिर ख़ान on December 3, 2015 at 11:43am

आदरणीया प्रतिभा जी हौसला अफ़ज़ाई एवं टिप्स का शुक्रिया ..
तरबियत का हिन्दी अर्थ
1. सिखाने-पढ़ाने और सभ्य बनाने की क्रिया
2. शिक्षा-दीक्षा

Comment by pratibha pande on December 3, 2015 at 11:31am

कहानी का मर्म बहुत अच्छा है, हार्दिक बधाई  आदरणीय , वार्तालाप को इनवर्टेड कौमा "में रख दीजिये ,' तरबियत 'शब्द का अर्थ समझ में नहीं आया 

Comment by नादिर ख़ान on December 3, 2015 at 10:48am

आदरणीया  ज्योत्सना जी आदरणीय तेज वीर साहब बहुत शुक्रिया आपने रचना को सराहा। .. रचना पोस्ट करने से पहले बहुत संशय की स्थिति में था लघुकथा हुयी भी या नहीं चूँकि ये मेरी दूसरी लघुकथा है मुझे पता है बहुत कुछ सीखना है ।  सभी से निवेदन है कि कमियों के बारे में निसंकोच टिप्पणी करें । 

Comment by TEJ VEER SINGH on December 3, 2015 at 10:32am

हार्दिक बधाई आदरणीय नादिर खान साहब जी!अगर बच्चों को शिक्षा द्वारा समर्थ और योग्य बनाया जाय तो फ़िर दहेज़ रूपी दानव के पैर स्वयम ही उस घर में नहीं पडेंगे!सुन्दर लघुकथा!

Comment by jyotsna Kapil on December 3, 2015 at 6:27am
बढ़िया संकल्प है आदरणीय नादिर खान जी।आज समाज को ऐसे संकल्प की अति आवश्यकता है।

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