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बरसात के पानी ने -ग़ज़ल (लक्ष्मण धामी मुसाफिर' )

2211     2222     2112            22
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हर हद को ही  तोड़ा है  बरसात के पानी ने
किस बात  को माना  है बरसात के पानी ने /1

उस वक्त तो सूखा था जीवन क्या हरा होता
अब  गाँव  डुबाया  है  बरसात  के पानी ने /2

ये  जश्न  की  बेला  है  सूखे  की  विदाई की
नदिया को भी  न्योता है बरसात के पानी ने /3

मत खेत की  बोलो तुम भाग्य ही ऐसा  था
घर  द्वार भी  रौंदा है  बरसात  के पानी ने /4

कल रात सुना है  फिर सूखे की शिकायत पर
किस किस को न तोड़ा है बरसात के पानी ने /5

पहले से ही क्या कम था भीगा हुआ दामन जो
अब  और  भिगाया  है  बरसात  के  पानी ने /6

दुखती  हुई  आँखों से  मिलने पे कहा इतना
‘मुझसे भी  तो नाता है’ बरसात  के पानी ने /7

मौलिक व अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

Views: 849

Comment

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Comment by TEJ VEER SINGH on January 21, 2016 at 3:05pm

हार्दिक बधाई आदरणीय लक्ष्मण धामी जी!शानदार गज़ल!

पहले से ही क्या कम था भीगा हुआ दामन जो
अब  और  भिगाया  है  बरसात  के  पानी ने


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 20, 2016 at 8:45pm

221----1222---221---1222

मत खेत की  बोलो तुम, ये भाग्य ही ऐसा  था

शानदार ग़ज़ल

बधाई 

Comment by Shyam Narain Verma on January 20, 2016 at 5:27pm
बहुत सुन्दर ... सादर बधाई स्वीकारें आदरणीय
Comment by Samar kabeer on January 20, 2016 at 1:59pm
जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर'जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल से नवाज़ा आपने मंच को,बधाई स्वीकार करें |
चोथे शैर का ऊला मिसरा लय में नहीं लगता,देखियेगा |

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