थाप पे तबले की ....
थाप पे तबले की घुंघरू बजने लगे
किसने पहचानी इनकी परेशानियां
दाम लगने लगे ज़िस्म थिरकने लगे
आई नज़र में नज़र तो बस हैवानियाँ
थाप पे तबले की ......
सब खरीददार थे कोई अपना न था
सूनी आँखों में कोई भी सपना न था
चीर डाला हर एक हाथ ने जिस्म को
बज़्म में चश्म से दर्द छलकना न था
शोर साँसों की सिसकी का हर ओर था
हर सिम्त थी बस नादान नादानियां
पाँव घुंघरू बंधे महफ़िल में बजते रहे
किसने पहचानी इन की परेशानियां
दाम लगने लगे ज़िस्म थिरकने लगे
आई नज़र में नज़र तो बस हैवानियाँ
थाप पे तबले की ......
जिस्म ही जिस्म बेजान थे दूर तलक
उदास जिस्मों में थीं बेनूर रानाईयां
हर ठुमके पे सिक्कों की बरसात थी
थी किस्मत में बस इन की तन्हाईयाँ
मतलबी बाज़ार थे मतलबी रिश्ते वहां
हो गयी चुप सलवटों में कई कहानियाँ
तरबतर खून से पाँव रक्स करते रहे
रक्स आँखों में करती थी वीरानियाँ
दाम लगने लगे ज़िस्म थिरकने लगे
आई नज़र में नज़र तो बस हैवानियाँ
थाप पे तबले की ......
सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित
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आदरणीय सतविंदर कुमार जी प्रस्तुति में निहित भावों को मान देने का दिल से आभार।
आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी प्रस्तुति में निहित भावों को मान देने का दिल से आभार।
आदरणीया Samar kabeer जी प्रस्तुति में निहित भावों को मान देने का दिल से आभार।
आदरणीया Rahila जी प्रस्तुति में निहित भावों को मान देने का दिल से आभार।
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