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गुनगुनाऊँ मैं- ग़ज़ल (पंकज)

1222 1222 1222 1222

सदा खामोश रहने से है बेहतर गुनगुनाऊँ मैं।
कभी खुद की कभी औरों की ख़ातिर मुस्कुराऊँ मैं।।

ग़मों के नीर से दुनिया तो वैसे ही लबालब है।
बताओ क्यों भला आँखों से दरिया इक बहाऊँ मैं।।

रुलाने के लिए कारण बहुत सारे हैं राहों में।
अभीप्सा है कि रोते मन को भीतर तक हंसाऊँ मैं।।

नहीं मालूम हूँ कितना सफल मैं इस प्रयोजन में।
बिना फल की किये चिंता करम करता ही जाऊँ मैं।।

हाँ इतना तो है तय लोगों के भावों तक पहुंच मेरी।
तुम्हारे उसके सबके मन को कागज़ पर सजाऊँ मैं।।

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on February 18, 2016 at 12:06am
आदरणीय मिंटू जी सादर आभार
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on February 18, 2016 at 12:04am
आदरणीय मनोज भाई बहुत बहुत आभार, काफी दिनों बाद ओबीओ पर?
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on February 18, 2016 at 12:04am
आदरणीय अमित जी सादर धन्यवाद।
Comment by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on February 12, 2016 at 11:02pm

पंकज साहेब ...............बढ़िया है | बधाई 

Comment by मनोज अहसास on February 11, 2016 at 5:48pm
बहुत खूब मित्र
सादर
Comment by Amit Tripathi Azaad on February 11, 2016 at 5:44pm

आदरणीय पंकज जी " ग़मों के नीर से दुनियां  तो वैसे ही लबालब है " क्या बात है  बहुत  ही सकारात्मक सोंच  वाली ग़ज़ल के लिए  हार्दिक बधाई |

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on February 11, 2016 at 5:19pm
आदरणीय तेजवीर सर तथा श्याम नारायण सर ग़ज़ल की तारीफ करके हौसला बढ़ाने के लिए सादर धन्यवाद
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on February 11, 2016 at 5:16pm
आदरणीय मिथिलेश सर आपके सुझावों के अनुरूप आखिरी शेर में "काफ़िया" दोष दूर कर दिया है।

आदरणीय जयनीत भाई आपके सुझावों के अनुरूप संशोधन कर दिया गया है।
Comment by Shyam Narain Verma on February 11, 2016 at 4:24pm
अच्छी ग़ज़ल की हार्दिक बधाई ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 11, 2016 at 1:36am

आदरणीय पंकज जी बहुत बढ़िया ग़ज़ल कही है आपने. हार्दिक बधाई. मिसरे थोड़ा थोड़ा सा समय मांग रहे हैं. आखिरी शेर में 'उतारूँ ' काफ़िया कहाँ से आ गया आऊँ-आऊँ काफियाबंदी में....

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