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भीड़ में दुनिया के हम भी खो गए (ग़ज़ल)

2122 2122 212

भीड़ में दुनिया के हम भी खो गए
ख़ुद से जैसे अजनबी-से हो गए

ज़ख़्म-ए-दिल में थे तेरे बाकी निशां
अश्कों के सैलाब वो भी धो गए

आदमीयत होश में आने लगी
आदमी जब शह्र के सब सो गए

काटता हूँ फ़स्ल अम्न-ओ-चैन की
जो कभी पुरखे थे मेरे बो गए

आसमां ने सुन ली मेरी दास्तान
मेघ भी आके दो आंसू रो गए

लौटकर आए नहीं हैं आजतक
इस नगर से उस नगर तक जो गए
========================

जयनित कुमार मेहता
(मौलिक व अप्रकाशित)

Views: 576

Comment

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Comment by जयनित कुमार मेहता on February 23, 2016 at 9:38pm

आदरणीय सौरभ जी, सादर नमस्कार।

जब आप जैसे गुरुजनों का आशीर्वाद हो तो शिष्य के प्रयास का सफल होना स्वाभाविक है।

रचना की सराहना के लिए पुनः आभार व्यक्त करता हूँ।।

Comment by जयनित कुमार मेहता on February 23, 2016 at 9:28pm

आदरणीय धर्मेन्द्र जी, ग़ज़ल पर आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूँ।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 23, 2016 at 1:46pm

अंतिम शेर ने तो बस गुम ही कर दिया भाई ! 

आपकी ग़ज़लें अचानक बतियाने लगी हैं और हम सब किस्सापसंद लोग है. खूब सुनना चाहते हैं .. 

दाद दाद

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on February 23, 2016 at 1:33pm

बड़ा मुश्किल काफ़िया उठाया जयनित जी। इसे निभाना आसान नहीं है। दाद कुबूल करें।

Comment by जयनित कुमार मेहता on February 23, 2016 at 11:37am
आदरणीय कांता रॉय जी, सादर नमस्कार।
ग़ज़ल पर आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हृदय से धन्यवाद आपको।।
Comment by जयनित कुमार मेहता on February 23, 2016 at 11:32am
आदरणीय कांता रॉय जी, सादर नमस्कार।
ग़ज़ल पर आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हृदय से धन्यवाद आपको।।
Comment by जयनित कुमार मेहता on February 23, 2016 at 11:32am
आदरणीय कांता रॉय जी, सादर नमस्कार।
ग़ज़ल पर आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हृदय से धन्यवाद आपको।।
Comment by kanta roy on February 23, 2016 at 10:38am
लौटकर आए नहीं हैं आजतक
इस नगर से उस नगर तक जो गए----- वाह ! बहुत खूब कहा है आपने ये । बेहतरीन गजल हुई है आपकी यह भी आदरणीय जयनित जी । चंद शेर आपकी ऐसी बनी है कि वो हमें भी जार - जार रूला गयी है । बधाई आपको तहेदिल ।

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