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दिन गुज़रता रहा, रात ढलती रही (ग़ज़ल)

212 212 212 212

दिन गुज़रता रहा, रात ढलती रही
दिल में उम्मीद की शम्अ जलती रही

सोचकर,किस क़दर फ़ासला ये मिटे
रात-दिन ज़िंदगानी पिघलती रही

वाकया शह्र में आम ये हो गया
आदमी मर गया,साँस चलती रही

आदमी, आदमी को चबाता रहा
आदमीयत खड़ी हाथ मलती रही

बेक़ली, बेबसी, बेख़ुदी ना गई
सिर्फ कहने को ही रुत बदलती रही

कर गया था वो पूरी मेरी हर कमी
फिर,कमी उसकी ताउम्र खलती रही

एक गिरते हुए को उठा क्या दिया
ज़िन्दगी भर दुआ उसकी फलती रही
=======================
जयनित कुमार मेहता
(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on February 23, 2016 at 1:43pm

अच्छी ग़ज़ल हुई है जयनित जी। दाद कुबूल करें। 

"बेक़ली, बेबसी, बेख़ुदी ना गई" में "ना" को "कब" कर सकते हैं।

Comment by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on February 12, 2016 at 11:06pm

 आदरणीय जयनित  जी ..............बधाई |

Comment by जयनित कुमार मेहता on February 11, 2016 at 9:00pm
मेरे परिश्रम को सार्थक करने के लिए सभी सम्मानित सदस्यों, आदरणीय गुणीजनों के प्रति हार्दिक आभार प्रकट करता हूँ।
Comment by Ravi Shukla on February 11, 2016 at 12:53pm

आदरणीय जयनित कुमार जी बहुत खूब ग़ज़ल कही है आपने बधाई स्‍वीकार करें  आखिरी शेर तो लाजवाब हुआ है

Comment by Samar kabeer on February 11, 2016 at 10:32am
जनाब जयनित कुमार मेहता जी आदाब,बहुत उम्दा ग़ज़ल कही बधाई स्वीकार करें !
मुझे भी ग़ज़ल सुनते ही "शमा"फ़िल्म की ग़ज़ल याद आ गई |
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on February 11, 2016 at 8:46am
वाह्ह्ह्ह्ह्!बहुत ख़ूब।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 11, 2016 at 1:26am

आदरणीय जयनित जी, बहुत बढ़िया ग़ज़ल कही है आपने. शेर दर शेर दाद कुबूल फरमाएं. ये ग़ज़ल गुनगुनाते हुए  'शमा' फिल्म का ज़फर गोरखपुरी जी का लिखा गीत याद आ गया. वह गीत भी इसी जमीन पर है -

//मैं उजालों की नाकाम हसरत लिए 
उम्र भर मोम बन कर पिघलती रही
चाँद अपना सफ़र ख़त्म करता रहा
शमा जलती रही रात ढलती रही//
Comment by नादिर ख़ान on February 10, 2016 at 4:27pm

एक गिरते हुए को उठा क्या दिया
ज़िन्दगी भर दुआ उसकी फलती रही
वाह आदरणीय जयनित जी खूबसूरत ग़ज़ल कही आपने, मुबारकबाद इस उम्दा रचनाकर्म के लिए

Comment by Rahila on February 10, 2016 at 3:31pm
किसी एक शेर की तारीफ़ करू तो नाइंसाफी होगी । पूरी की पूरी ग़ज़ल ही शानदार हुई है । बहुत -बहुत बधाई आदरणीय जयनित जी । सादर
Comment by TEJ VEER SINGH on February 10, 2016 at 2:48pm

हार्दिक बधाई आदरणीय जयनित कुमार जी!बेहतरीन गज़ल!

कर गया था वो पूरी मेरी हर कमी
फिर,कमी उसकी ताउम्र खलती रही

एक गिरते हुए को उठा क्या दिया
ज़िन्दगी भर दुआ उसकी फलती रही

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