For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

खिलौने वाली गन (लघुकथा) – शुभ्रान्शु पाण्डॆय

खिलौने वाली गन (लघुकथा) – शुभ्रान्शु पाण्डॆय

==================================

“पापा, वो वाली गन !  देखो न, कितनी असली सी लगती है !” – सुपर बाज़ार की भीड़-भाड़ में बिट्टू उस खिलौने वाली गन के पीछे हठ कर बैठा था ।

“नहीं बेटा.. हमें वो चावल वाली सेल के पास चलना है । जल्दी करो, नहीं तो वो खत्म हो जायेगा..”

“पापा, इस पर भी सेल की बोर्ड लगा रखी है.. पापा ले लो ना…प्लीऽऽज..”,

बिट्टू की मनुहार भरी आवाज सुन कर किसी का मन न रीझ जाये । लेकिन रमेश अपने एक मात्र हजार रुपये के नोट को जेब में ही कस के पकड़ रखा था । महीने के आखरी कुछ दिन थे । और फिलहाल यही उसकी पूँजी थी ।

“पापा प्लीज….”

“नहीं बेटा, ये सही नहीं.. चाइनिज है.. जल्द ही  टूट जायेगी.. तुम्हारे लिये बाद में बढिया ले कर देंगे !”

“पापा ये मजबूत लग रही है..”

रमेश की झुंझलाहट का पारा चढ़ने लगा था । कि तभी, एक झटके में उसने बिट्टू का हाथ खींच कर उसे अपने सामने कर दिया और उसकी आँखो में देखा ।

बिट्टू ने अपनी नजर आस-पास डाली और धीरे से कहा, “हाँ पापा.. वो तनु है ना, शर्मा अंकल का बेटा, उसका तुरत टूट गया था..”  रमेश को अपना बचपन याद आ गया, जब वो किसी खिलौने के लिये अपने पापा के सामने जमीन पर ही लोट-लोट कर रोने लगता था । उसके पापा उसे भरे बाज़ार में एक-दो थप्पड लगा दिया करते थे । उसे लगा बिट्टू बडा़ हो गया है । तभी तो एक ही बार में बात को समझ कर उसने जिद्द छोड़ दी । उसे सही-गलत खरीदने की पहचान हो गयी है ! या.. उसे अपने पापा की आँखों से झाँकती मजबूरी पढनी आ गयी थी !

(मौलिक व अप्रकाशित)

Views: 728

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 23, 2016 at 5:08pm

बहुत बढ़िया , पदकर मन  हठात भावुक हो उठा. यह रचना की सफलता  है . 

Comment by Nita Kasar on March 23, 2016 at 2:45pm
कुछ बच्चे समझदार होते है जिनके आँखों में पिता अपना बचपन पढ लेते है ।वरना आजकल के बच्चे की हर हर फ़रमाइश माँग करते पूरी हो जाती है ।बधाई आपको सारगर्भित कथा के लिये आद० shubharanshu pandey ji
Comment by Shubhranshu Pandey on March 23, 2016 at 11:00am

आदरणीय पवन जैन जी, 

कथा के मूल को आपने बता दिया.

सादर

Comment by Shubhranshu Pandey on March 23, 2016 at 10:59am

आदरणीया नयना (आरती) कानिटकर जी, 

बच्चे की मानसिकता आज कल बहुत ज्यादा गुढ़ होती जा रही है. 

सादर.

Comment by Shubhranshu Pandey on March 23, 2016 at 10:57am

आदरणीया राहिला जी, 

अपना विचार रखने के लिये आभार. 

सादर.

Comment by Shubhranshu Pandey on March 23, 2016 at 10:55am

आदरणीय तेज वीर सिंह 

कथा पर आने के लिये धन्यवाद. इस भागमभाग में कहीं बच्चे  जरुरत से ज्यादा बडॆ होते जा रहे हैं. 

सादर.

Comment by Pawan Jain on March 22, 2016 at 5:11pm

वाह उसे मजबूरी पढनी आ गई ।बधाई आदरणीय ।

Comment by नयना(आरती)कानिटकर on March 22, 2016 at 5:02pm
शुभ्रांशु जी बच्चे की मानसिकता पर सार्थक रचना।आजकल बच्चे जल्दी समझदार हो जाते हैं
Comment by Rahila on March 22, 2016 at 4:14pm
बहुत अच्छी प्रस्तुति आद. पाण्डे सर जी!जहाँ आजकल के बच्चे जिद्दी है वहीं बहुत समझदार भी । हार्दिक बधाई आपको इस रचना के लिये । सादर
Comment by TEJ VEER SINGH on March 22, 2016 at 11:34am

हार्दिक बधाई शुभ्रांशु जी!बेहतरीन लघुकथा!बाप और बेटे की मन की भावनाओं का अच्छा आंकलन और प्रस्तुतीकरण  किया है!

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई सौरभ जी सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और विस्तृत टिप्पणी से मार्गदर्शन के लिए हार्दिक आभार।…"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post सच काफिले में झूठ सा जाता नहीं कभी - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद।"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post आदमी क्या आदमी को जानता है -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई रवि जी सादर अभिवादन। गजल पर आपकी उपस्थिति का संज्ञान देर से लेने के लिए क्षमा चाहता.हूँ।…"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय अशोक भाई, आपके प्रस्तुत प्रयास से मन मुग्ध है. मैं प्रति शे’र अपनी बात रखता…"
Friday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ
"रचना पर आपकी पाठकीय प्रतिक्रिया सुखद है, आदरणीय चेतन प्रकाश जी.  आपका हार्दिक धन्यवाद "
Friday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ
"उत्साहवर्द्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय अशोक भाईजी "
Friday
Ashok Kumar Raktale posted blog posts
Friday
Chetan Prakash commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ
"नव वर्ष  की संक्रांति की घड़ी में वर्तमान की संवेदनहीनता और  सोच की जड़ता पर प्रहार करता…"
Friday
Sushil Sarna posted blog posts
Friday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . क्रोध
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय जी । "
Friday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . क्रोध
"आदरणीय अशोक रक्ताले जी सृजन पर आपकी समीक्षात्मक प्रतिक्रिया का दिल से आभार । इंगित बिन्दु पर सहमत…"
Friday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post कुर्सी जिसे भी सौंप दो बदलेगा कुछ नहीं-लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई सौरभ जी सादर अभिवादन। गजलपर उपस्थिति और सप्रेमं मार्गदर्शन के लिए हार्दिक आभार। इसे बेहतर…"
Thursday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service