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गज़ल : मधु-मिलन -रामबली गुप्ता

वह्र-122 122 122 122

निशा मध्य धीरे से घूँघट उठेगा।
खिला रूप विधु का ये मन मोह लेगा।।

प्रतीक्षा हृदय जिसकी करता रहा है।
उसी रात्रि का इंदु हिय में खिलेगा।।

मुदित होंगे मन सुख के सपने सजेंगे।
अमित स्रोत सुख का उमड़ के बहेगा।।

रहा आज तक है जो अव्यक्त हिय में।
वही प्रेम-सागर तरंगें भरेगा।।

नयन बंद होंगे अधर चुप रहेंगे।
मुखर मौन ही हाल हिय का कहेगा।।

खिला पुष्प-यौवन बिखेरेगा सौरभ।
भ्रमर पी अमिय मत्त आहें भरेगा।।

मिलन की प्रथम रैन होगी सुधामय।
अधर की छुवन से सकल तन खिलेगा।।

रचना-रामबली गुप्ता
मौलिक एवं अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 27, 2016 at 12:25pm

प्रेमभाव से आप्लावित सुन्दर ग़ज़ल कही  है आद० रामबली जी हार्दिक बधाई |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 26, 2016 at 5:30pm

आदरणीय रामबली भाई , बहुत सुन्दर गज़ल कही आपने , दिल से बधाइयाँ आपको ।

Comment by रामबली गुप्ता on July 26, 2016 at 12:11pm
हृदय से आभार आद0 श्याम नारायण जी
Comment by Shyam Narain Verma on July 26, 2016 at 12:08pm
क्या बात है .... बहुत उम्दा | बधाई आप को 
Comment by रामबली गुप्ता on July 26, 2016 at 9:27am
बहुत बहुत आभार आद0सुनील जी
Comment by रामबली गुप्ता on July 26, 2016 at 9:25am
सादर आभार आद0 सुशील सरना जी
Comment by shree suneel on July 26, 2016 at 2:50am
क्या बात है! बहुत सुन्दर. अपकी इस मनभावन प्रस्तुति पर आपको हार्दिक हार्दिक बधाई आदरणीय रामबली गुप्ता जी. सादर.
Comment by Sushil Sarna on July 25, 2016 at 6:48pm

नयन बंद होंगे अधर चुप रहेंगे।
मुखर मौन ही हाल हिय का कहेगा।।

वह आदरणीय रामबली गुप्ता जी वाह प्रेमभावों की अव्यक्त अनुभूति को आपने अपनी हिंदी ग़ज़ल में बहुत ही सुंदर ढंग से उकेरा है। हार्दिक बधाई स्वीकार करें मित्र।

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