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ग़ज़ल - मेरे दर्दे गम की कहानी न पूछो

122 122 122 122


मेरे दर्दो गम की कहानी न पूछो ।
मुहब्बत की कोई निशानी न पूछो ।।

बहुत आरजूएं दफन मकबरे में ।
कयामत से गुजरी जवानी न पूछो ।।

मुझे याद है वो तरन्नुम तुम्हारा ।
ग़ज़ल महफ़िलों की पुरानी न पूछो ।।

हुई रफ्ता रफ्ता जवां सब अदाएं ।
सितम ढा गयी कब सयानी न पूछो ।।

बयां हो गई इश्क की हर हकीकत ।
समन्दर की लहरों का पानी न पूछो ।।

सलामी नजर से नज़र कर गयी थी ।
वो चिलमन से नज़रें झुकानी न पूछो ।।

मुलाक़ात ऐसी न कुछ कह सके हम ।
रही बात क्या क्या बतानी न पूछो ।।

-- नवीन मणि त्रिपाठी
मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on August 27, 2016 at 1:58pm

बहुत ही सरस सुंदर ग़ज़ल

Comment by Naveen Mani Tripathi on August 27, 2016 at 6:57am
आ0 डॉ आशुतोष मिश्र जी सादर आभार ।
Comment by Dr Ashutosh Mishra on August 25, 2016 at 4:14pm

आदरणीय नवीन जी इस बेहतरीन ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 25, 2016 at 9:50am

आदरणीय नवीन भाई , बेहरतीन गज़ल हुई है , दिल से बधाइयाँ आपको ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on August 24, 2016 at 10:33pm
आदरणीया प्रतिभा त्रिपाठी जी सादर नमन ।
Comment by Naveen Mani Tripathi on August 24, 2016 at 10:30pm
جناب کبیر صاہب بہت بہت شکریا
Comment by Samar kabeer on August 24, 2016 at 3:06pm
जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है, शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं ।
दूसरे शैर में सही शब्द "दफ़्न"है, आपकी जानकारी के लिये बता रहा हूँ ।

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