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करबटें बदलता हूँ

करबटें बदलता हूँ रात भर मैं गलता हूँ

जख्म दिए औरों ने पर मैं खुद ही सिलता हूँ

 

मुँह मोड़ लिया हो अपनों ने तोड़ दिया हो सपनों ने

हर बार मगर हँसकर सबसे अक्सर मैं मिलता हूँ

 

जिन गलियों में बस शूल मिले यादों की बस कुछ धूल मिले

कभी रहे काशी काबा में हर रोज मैं पैदल चलता हूँ

 

वक्त के इस दौर में निकला मैं जिस भी ओर में

सदा बचा मैं शोलों से पर पानी से मैं जलता हूँ

 

सुबह भी देखी थी निराली पल भर में जो हुई थी काली

जिस धुंध में जग ये सोता है मैं उन रातों में पलता हूँ

 

उस फूल के जैसा मेरा मुकद्दर जो मसल दिया जाता है

अंजाम मुझे भी मालूम है फिर भी हर रोज मैं खिलता हूँ

"मौलिक अप्रकाशित"

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Comment

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Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on September 27, 2016 at 10:26am
आदरणीय श्री अनुपम चौबे जी सुन्दर भावाभिव्यक्ति के लिए हार्दिक बधाई प्रेषित है । सादर ।
Comment by Samar kabeer on September 26, 2016 at 11:29pm
जनाब अनुपम चौबे जी आदाब,पहली बार आपकी किसी रचना से गुज़र रहा हूँ ,चूँकि आपने रचना पर विधा का नाम नहीं लिखा इसलिये मैं इसे मान लेता हूँ ,इस हिसाब से देखा जाये तो आपका ये प्रयास बहुत अच्छा है लेकिन अभी आपको अभ्यास की बहुत ज़रूरत है,इसके बारे में जानकारी हासिल करने के लिये हमारे मंच पर उपलब्ध 'ग़ज़ल की कक्षा' का लाभ आप ले सकते हैं,मंच का एक नियम यह भी है कि ग़ज़ल के साथ उसके अरकान भी लिखे जाऐं ताकि पढ़ने और समझने वालों के लिये आसानी हो ,उम्मीद है आप आगे भी यह सिलसिला जारी रखेंगे ।
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on September 26, 2016 at 8:49pm
बहुत बढ़िया भाव । हार्दिक बधाई आदरणीया ।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on September 26, 2016 at 3:52pm
बहुत बढ़िया भाव पिरोये हैं आपने। सादर हार्दिक बधाई आपको आदरणीय अनुपम चौबे जी।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on September 26, 2016 at 3:32pm

अच्छी भावाभिव्यक्ति है 

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