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आ० शेख साहिब , बड़ी मार्मिक कथा कही आपने . मैथिलीशरण जी की काव्य पंक्ति उभर आयी -अबला जीवन हाय ! तुम्हारी यही कहानी . आँचल में है दूध और आँखों में पानी .
आपकी ये रचना नायक की शख्सियत के दो पक्ष खोल रही है पहला बच्ची को प्यार करने वाला पिता और दूसरा बेरूखी से भरा पति , दोनों ही पक्षों का चित्रण आपने बखूबी किया है ... बधाई स्वीकार करें इस सशक्त प्रस्तुति पर आदरणीय उस्मानी जी
क्या फ़र्क है इक शजर में और एक स्त्री में फल से तो प्यार होता है और शजर को पत्थर मिलते हैं ..इस लघु कथा को पढ़कर यही एहसास हुआ जिस बेटी को उसने पैदा किया उसका बहुत ख़याल है मगर उससे ? सोचने पर विवश करती लघु कथा |
बहुत बहुत बधाई इस उम्दा प्रस्तुति पर |आद० उस्मानी जी
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