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पागल या बदनसीब (लघुकथा) / शेख़ शहज़ाद उस्मानी

व्यस्त मुख्य सड़क पर भारी वाहनों की आवा-जाही के बीच साइकिलों पर सवार विद्यालयीन छात्रायें बातचीत करती हुईं अपने विद्यालय की ओर जा रही थीं। उसी दिशा में जा रहे स्कूटर पर सवार एक शिक्षक ने अपने वाहन की गति धीमी करके दो छात्राओं को समझाने की कोशिश करते हुए कहा-"भारी ट्रक आ-जा रहे हैं, बातें करते हुए साइकल मत चलाईये!" - इतना कहा ही था कि पीछे से एक कार ने शिक्षक के स्कूटर को यूं टक्कर मारी कि वह उछलकर गिर पड़ा और वाहन दूसरी ओर बहक गया।

दोनों छात्राओं में से एक ने पीछे मुड़ कर देखा और सहेली से कहा-"गिरा ... पागल, हमें सिखाने चला था!"

घटना के चश्मदीद गवाह एक ग्रामीण राहगीर ने शिक्षक को सहारा देकर उठाया और कहा-"पागल तो भैया आजकल की पीढ़ी है!"

"नहीं भाई, पागल तो मैं ही हूँ! वाहन चलाते समय मुझे उनसे कुछ नहीं कहना चाहिए था! समय के साथ चलने में वे अभ्यस्त हैं, हम नहीं!"

छात्रायें काफी आगे निकल चुकीं थीं और कार भी!

[मौलिक व अप्रकाशित]

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on September 4, 2016 at 8:04pm
आपके अनुमोदन से मेरा यह प्रयास सफल हुआ। मेरी इस ब्लोग पोस्ट पर उपस्थित हो कर हौसला अफ़ज़ाई हेतु बहुत बहुत हार्दिक धन्यवाद आदरणीया कान्ता राय जी।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on September 4, 2016 at 8:03pm
आपको यह प्रस्तुति पसंद आई, बहुत प्रसन्नता हुई। मेरी रचना पर पहली बार टिप्पणी कर प्रोत्साहित करने के लिए बहुत बहुत हार्दिक धन्यवाद आदरणीया अलका चांगा जी।
Comment by kanta roy on September 4, 2016 at 3:04pm
बहुत बढ़िया कथ्य उभरकर आया है आपकी लघुकथा में आदरणीय शहजाद जी।बधाई प्रेषित है।
Comment by अलका 'कृष्णांशी' on September 3, 2016 at 6:04pm

शानदार लघुकथा ,बहुत खूब आदरणीय

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on September 3, 2016 at 5:05pm
सदैव हार्दिक स्वागत है आपकी मार्गदर्शक टिप्पणियों का मोहतरम जनाब गिरिराज भंडारी साहब व जनाब समर कबीर साहब। अपने विचारों से अवगत कराने व स्नेहिल हौसला अफ़ज़ाई के लिए तहे दिल से बहुत बहुत शुक्रिया।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 2, 2016 at 4:56pm

छात्रायें काफी आगे निकल चुकीं थीं और कार भी    --  सच है भाई जी अब तो और काफी आगे निकलचुकी होंगी , मुँह बान्धे हुये , आतंकवादियों जैसे । लेकिन ये भी सच है कि वो मानते नहीं किसी की , ऐसों को समय ही सिखायेगा ।

आपकी कथा अच्छी लगी , आदरनीय , इसी बहाने मैभी अपने विचार रख दिया । आपको हार्दिक बधाई ।

Comment by Samar kabeer on September 2, 2016 at 3:42pm
जनाब शैख़ शहज़ाद उस्मानी साहिब आदाब,बहुत अच्छा सबक़ दे रही है आपकी लघुकथा,इस शानदार प्रतुति पर दिल से बधाई स्वीकार करें ।

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