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मेरी आँखों में बसी तीरगी को मत देखो (ग़ज़ल)

2122 1122 1212 22

सारे चेहरों में वो सबसे अलग जो चेहरा था
मेरी आँखों का फ़क़त इक हसीन धोखा था

सारे गुल तो हैं खियाबां में एक वो ही नहीं
जिसकी खुशबू से ये सारा चमन महकता था

आज तक ढूँढ़ता फिरता हूँ उसके नक़्श-ए-पा
इक मुसाफिर जो मेरे रास्ते से गुज़रा था

एक झटके में उड़ाकर ले गया चैन-ओ-करार
बस्ती-ए-दिल में वो तूफ़ान बन के आया था

मेरी आँखों में बसी तीरगी को मत देखो,
इक ज़माने में यहाँ जुगनुओं का डेरा था

जाने क्यों जेब में उसको लिए मैं फिरता रहा
जबकि वो एक गुज़िश्ता समय का सिक्का था

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by Ravi Shukla on October 17, 2016 at 1:59pm

आदरएाीय जयनित कुमार जी ,अच्छी ग़ज़ल कही है आपने  मुबारकबाद क़ुबूल करें ।

Comment by PRAMOD SRIVASTAVA on October 17, 2016 at 1:21pm

जयनित जी एक अच्छी गजल के लिए बधाई । काफिया  और रदीफ मे व्यतिक्रम महसूस हुआ है ।

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on October 16, 2016 at 6:49pm

आदरणीय  जयनित जी, अच्छी गजल के लिए मुबारकबाद कबूल फरमायें

Comment by नाथ सोनांचली on October 16, 2016 at 4:54pm
आदरणीय श्री जयनित कुमार मेहता जी सादर प्रणाम, अच्छी गजल के लिए मुबारकबाद कबूल फरमायें
Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on October 16, 2016 at 3:21pm
आदरणीय जयनीत जी खूबसूरत गजल के लिए मुबारकबाद कबूल फरमाएं । सादर ।
Comment by Samar kabeer on October 16, 2016 at 3:19pm
जनाब जयनित कुमार मेहता जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल है, मुबारकबाद क़ुबूल करें ।

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