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गीतिका/हिंदी गजल

दीप-पर्व पर(भुजंगप्रयात छंद)
122 122 122 122
*****************************
चलो रोशनी को जगाने चलें हम
अँधेरे यहाँ से हटाने चलें हम।1

रहे माँगते इक किरण का सहारा
लिये दीप कर में जलाने चलें हम।2

बँटे खेत कितनी तरह से अभी हैं
दिलों की लकीरें मिटाने चलें हम।3

बहुत बार देखी नजाकत जहाँ की
जरा नाज अपना दिखाने चलें हम।4

कहानी हुआ भेद बढ़ना यहाँ का
चलो आज पर्दा उठाने चलें हम।5

इशारों पे' अबतक उझकते फिरे हैं
इशारों से' आओ नचाने चलें हम।6

लड़े हैं बहुत अब तलक बेवजह के
बढ़ो आज नजरें लड़ाने चलें हम।7
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

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Comment by Manan Kumar singh on November 4, 2016 at 3:45pm
आदरणीय समर जी,यह सच है।समीक्षात्मक टिप्पणियाँ सीखने-समझने के खयाल से बेहतर होती हैं।
Comment by Manan Kumar singh on November 1, 2016 at 8:40am
आभार आपका आदरणीय लक्ष्मण जी।
Comment by Manan Kumar singh on November 1, 2016 at 8:39am
आपका बहुत बहुत आभार आदरणीय गिरिराज भाई।
Comment by Manan Kumar singh on October 29, 2016 at 5:27pm
आपका आभारी हूँ,आदरणीय रामबली जी।
Comment by Samar kabeer on October 25, 2016 at 5:35pm
कुछ समय से देखने में आ रहा है कि कुछ सदस्य अपनी प्रतिक्रया बहुत क्म शब्दों में देते हैं,जो सही नहीं है,और ये ओबीओ की परम्परा के विरुद्ध भी है,उन सभी से मेरा विनम्र निवेदन है कि शाइर हो या कवि या लघुकथा कार, वो बड़ी मिहनत से आपके समक्ष अपनी रचना रखता है,और हमारे पास जैसे शब्दों का अकाल पड़ा हुआ है,"ख़ूब ग़ज़ल कही" "अच्छी रचना हुई""आभार आदरणीय"ऐसी प्रतिक्रयाओं से क्या लाभ ?वो तो ग़नीमत है कि इस मंच पर लाइक वाला आब्शन नहीं है,वरना उस पर उंगली रखकर ही चलते बनें । मेरा अनुरोध है कि ओबीओ की गरिमा को ठेस न पहुंचाएं बल्कि उसे बढ़ाने में अपना योगदान दें । कृपया मेरी बात को अन्यथा न लें ।
Comment by savitamishra on October 25, 2016 at 5:04pm

बहुत खूबसूरतग़जल|

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on October 25, 2016 at 3:47pm

सुंदर गजल हुई है | चौथे युग्म की दूसरी पंक्ति में जरा रूत का अर्थ का आशय समझ नहीं आया  | सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 25, 2016 at 10:03am

आदरणीय मनन भाई , खूब सूरत ग़ज़ल हुई है , हार्दिक बधाइयाँ ।

इस मिसरे को देखियेगा -

जरा रूत अपनी दिखाने चलें हम    ---    रुत मेरे खयाल से 2 हो गा आपने 21 लिया है , कंफर्म कर लीजियेगा

बेवजह के   --  बेवज़ह के बाद के सही नही लग रहा है ,   ही करके देखिये भला ।

Comment by रामबली गुप्ता on October 25, 2016 at 1:48am
वाह वाह इस खूबसूरत ग़ज़ल के लिए दिल से मुबारकबाद लीजिये आद0 मनन भाई जी
Comment by Manan Kumar singh on October 23, 2016 at 9:31pm
आभार आपका

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"आ. भाई अमीरुद्दीन जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए आभार।"
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