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किस ओर जाएँ हम कि हमें रास्ता मिले

221 2121 1221 212

किस ओर जाएँ हम कि हमें रास्ता मिले

फ़िरक़ापरस्ती का न कहीं फन उठा मिले

 

दिल इस जहान का अभी इतना बड़ा नहीं

हर हक़बयानी पर मेरा ही सर झुका मिले

 

नाज़ुक है मसअला ये अक़ीदत का दोस्तो

आईना जो दिखाऊँ तो बस बद्दुआ मिले

 

ख़्वाहिश कहाँ रही मुझे महलों की ऐ ख़ुदा

बस ज़ेरे-आसमाँ तेरा ही आसरा मिले

 

ढहने लगी हैं आज अदब की इमारतें

इतिहास मलबे में यहाँ कुचला हुआ मिले

 

धरती थमी-थमी है फलक भी झुका-झुका

मैं मुंतज़िर हूँ अब कि कज़ा मुझसे आ मिले

 

इंसान खो गया कहीं आभासी दुनिया में

अब तर्जनी से अपनी, सुकूँ ढूँढता मिले

 

Meaning:

फ़िरक़ापरस्ती - सम्प्रदायवाद, हक़बयानी – सच कहना, अक़ीदत - श्रद्धा,

ज़ेरे-आसमाँ - आसमाँ के नीचे, अदब – साहित्य, मुंतज़िर – इंतज़ार में, कज़ा – मौत

-मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by शिज्जु "शकूर" on January 11, 2017 at 11:52am

बहुत-बहुत शुक्रिया आ. राजेश दीदी


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Comment by rajesh kumari on December 15, 2016 at 6:19pm

बहुत सुंदर ग़ज़ल हुई शिज्जू भैया दिल से दाद प्रेषित है |


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Comment by शिज्जु "शकूर" on November 28, 2016 at 2:45pm

आ. मिथिलेश जी, जनाब तस्दीक अहमद साहिब, आ. कालीपद सर, आ. गिरिराज सर, आ. धर्मेंद्र जी, आ. विजय निकोर सर मेरी ग़ज़ल को मान देेने के लिए मैं तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ. आगे भी यूँ ही हौसला अफ़्ज़ाई करते हैं यही इल्तिज़ा है.

Comment by vijay nikore on November 28, 2016 at 7:56am

खूबसूरत गज़ल के लिए बधाई।

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 27, 2016 at 6:59pm

अच्छे अश’आर हुए हैं आदरणीय शिज्जू जी, दाद कुबूल करें।


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Comment by गिरिराज भंडारी on November 24, 2016 at 10:42am

आदर्णीय शिज्जु भाई , अच्छी गज़ल कही है . हार्दिक अधाइयाँ आपको ।

Comment by Kalipad Prasad Mandal on November 23, 2016 at 10:05pm

बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई जनाब शिज्जू शकूर साहिब |

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on November 23, 2016 at 7:24pm

मुहतरम जनाब शकूर साहिब , अच्छी ग़ज़ल हुई है , दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं ---


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Comment by मिथिलेश वामनकर on November 23, 2016 at 6:55pm

आदरणीय शिज्जू भाई जी, बहुत शानदार ग़ज़ल कही है. दाद ओ मुबारकबाद कुबूल फरमाएं.

आदरणीय समर कबीर जी की उस्तादाना नज़र के कायल हैं. सादर 


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Comment by शिज्जु "शकूर" on November 23, 2016 at 3:41pm

बहुत बहुत शुक्रिया जनाब समर साहब, सुझाव का शुक्रिया.

///इस ग़ज़ल की ये कमज़ोरी है कि इसके पांच अशआर में 'न'की तकरार है/// ये आपने बताया तभी मेरा ध्यान गया पहले मेरा ध्यान नहीं गया था. आगे से ध्यान रखूंगा

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