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झिलमिल तारों सा सपनो के अम्बर में रहते हो क्यों ?

मलयानिल की मधु धारा सा मानस में बहते हो क्यों?

 

रेशम सी शर्मीली आँखे गाथा कहती है मन की

निर्ममता के अभिनय क्षण में अंतर्गत चहते हो क्यों?

 

अंतस में भावों की गंगा यदि पावन है पूजा सी

तो संकल्पों की वर्षा हो फिर पीड़ा सहते हो क्यों?

 

वृन्दावन की वीथी में तुमने ही झिटकी थी बाहें

फिर उन बाँहों को मंदिर की शाला में गहते हो क्यों?

 

प्राणों का रसमय बंधन वह तुमने ठुकराकर तोड़ा  

विरहा की पावक लपटों में अब बेबश दहते हो क्यों?

 

आहों के सरगम पर जीवन जाने है कितने बीते   

तब फिर तुम तटिनी के तट सा राका में ढहते हो क्यों?

 

युग की निष्ठुरता का बाना धारण यदि कर ही डाला

तो सबसे उस मधुचर्या की मृदु बातें कहते हो क्यों ? 

 (मौलिक/अप्रकाशित)

 

 

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Comment by मिथिलेश वामनकर on January 19, 2017 at 10:51pm

आदरणीय गोपाल सर, बढ़िया ग़ज़ल कही है आपने. हार्दिक बधाई. सादर 

Comment by Samar kabeer on January 19, 2017 at 9:34pm
जनाब डॉ.गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी आदाब,अभी मैं जनाब सौरभ पाण्डेय साहिब से इसी मात्रिक बह्र पर चर्चा कर रहा था,और इधर आपकी ग़ज़ल सामना गई,बहुत ख़ूब वाह, क्या बहतरीन ग़ज़ल कही है आपने जितनी तारीफ़ की जाये कम होगी,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
कुछ मिसरों में टाइपिंग मिस्टेक हुई है,उन्हें देख ले,जैसे दूसरे शैर में 'हैं'की ज़रूरत है ।
4थे में 'थीं' करें
5वें के सानी में 'बेबश'को "बेबस" करें
6ठे शैर के ऊला में 'आहों की'करें,'सरगम' स्त्रीलिंग है
बाक़ी शुभ शुभ ।

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