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तरही गजल : फूल जंगल में खिले किन के लिये

2122 2122 212

कार्ड काफी था न लॉगिन के लिए
वो हमे भी ले गए पिन के लिए

चाँद पर जाकर शहद वो खा रहे
आप अब भी रो रहे जिन के लिए

शेर को आता है बस करना शिकार
फूल जंगल में खिले किन के लिए

गुठलियों के दाम भी वो ले गया
उसने शीरीं आम जब गिन के लिये

आ गई अब ब्रेड में बीमारियाँ
जी रहे थे क्या इसी दिन के लिए

आये थे जापान से कल लौट कर
फिर उड़े वो रूस बर्लिन के लिए

पास पप्पू एक दिन हो जाएगा
है दुआ इस गैर मुमकिन के लिए

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by vijay nikore on June 24, 2017 at 11:21am

इस खूबसूरत गज़ल के लिए मुबारकबाद।

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on May 15, 2017 at 6:32pm
आदरणीय रवि शुक्ल सर,उम्दा अशआर हुए हैं ,हार्दिक बधाई स्वीकारें!
Comment by Mahendra Kumar on May 15, 2017 at 12:14pm

आदरणीय रवि सर, बहुत दूर तक मार कर रही है आपकी ग़ज़ल. अलहदा काफियों से सजी इस खूबसूरत ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. सादर.

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on May 11, 2017 at 10:42pm

मुहतरम जनाब रवि साहिब, खूबसूरत ग़ज़ल हुई है दाद के साथ
मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएँ -------शेर 2 में तक़ाबुले -रदिफेन हो गया
'' खा रहे वो चाँद पर जाकर शहद ''------सादर

Comment by Ravi Shukla on May 11, 2017 at 6:06pm

आदरणीय आशुतोष जी आपकी उत्‍साह बढाती इस टिप्‍पणी से बहुत खुशी हुई आपका बहुत बहुत धन्‍यवाद साथ ही ओ बी ओ का भी कि उसके माध्‍यम से प्राप्‍त ज्ञान से हम भीकुछ कहने में सक्षम हुए जिसे आप सब ने पहचाना और सराहना की । सादर

Comment by Ravi Shukla on May 11, 2017 at 6:04pm

आदरणीय शिज्‍जु भाई आपकी सराहना प्रफुल्लित कर देती है बहुत बहुत आभार

Comment by Ravi Shukla on May 11, 2017 at 6:03pm

आदरणीय समर साहब आपका आग्रह आदेश है इसीलिय बडों की बात मानकर मंच की प्रति में भी सुधार कर लिया है । आभार

Comment by Ravi Shukla on May 11, 2017 at 6:02pm

आदरणीय सुशील जी आपका बहुत बहुत धन्‍यवाद गजल पसंद आई आपको  आप जैसे सजग पाठक का ह्रदय से स्‍वागत है आप सभी रचनाओ पर उपस्थित होते है और अपनी टिप्‍पणियों से हौसला बढ़ाते है जबकि हम अतुकांत कविताओ पर अपने अज्ञान के कारण आपकी रचनाआें पर उपस्‍ि‍थति दर्ज करने में संकोच करते है आशा है आप इसे अन्‍यथा न लेते हुए अपना स्‍नेह ऐसे ही बनाए रखेंगे । सादर

Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 9, 2017 at 7:04pm
आदरणीय रवि सर मस्त मस्त ग़ज़ल हुयी है आपका ये अनोखा अंदाज़ है अखबार बाली ग़ज़ल बरबस याद आ गयी आपको ढेर सारी बधाई सादर
Comment by Samar kabeer on May 9, 2017 at 6:07pm
मेरे कहे को मान देने के लिये धन्यवाद ।

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