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मापनी २१२ २१२ २१२ २१२ 

रात दिन बस यही सोचता रह गया

पास आकर भी क्यों फासला रह गया  

 

पत्थरों से लड़ाई कहाँ तक करे,

तोप का मुँह सिला का सिला रह गया

 

चढ़ गयीं परतें मुखोटे पे’ उनके कई,

बेखबर देखता आइना रह  गया

 

वज्न  वे रोज अपना बढ़ाते रहे,

और भीतर हृदय खोखला रह गया

 

सामना जब हुआ देखते रह गए,

प्यार अन्दर छुपा का छुपा रह गया

 "मौलिक एवं अप्रकाशित "

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Comment by बसंत कुमार शर्मा on June 7, 2017 at 10:19pm

ह्रदय से आभार आदरणीय Mahendra Kumar जी आपका 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on June 7, 2017 at 8:56pm

ह्रदय से आभार आदरणीय Mahendra Kumar जी आपका 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on June 7, 2017 at 8:55pm

आभार आदरणीय Sushil Sarna जी का ह्रदय से आभार 

Comment by Mahendra Kumar on June 7, 2017 at 8:03pm

आ. बसंत कुमार जी, उम्दा ग़ज़ल कही है आपने. शेर दर शेर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल कीजिए. सादर.

 

Comment by Sushil Sarna on June 7, 2017 at 4:28pm

चढ़ गयीं परतें मुखोटे पे’ उनके कई,
बेखबर देखता आइना रह गया
वाह आदरणीय बसंत कुमार जी वाह। ... बहुत खूबसूरत अशआर कहे हैं आपने। हार्दिक बधाई इस दिलकश ग़ज़ल के लिए।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on June 7, 2017 at 3:34pm

आदरणीय सतविन्द्र कुमार जी , हौसला अफजाई के लिए बहुत बहुत शुक्रिया आपका 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on June 7, 2017 at 3:33pm

हौसला अफजाई एवं त्रुटि इंगित करने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया आपका आदरणीय  Ravi Shukla जी अब देखें

बह्र फाइलुन फाइलुन फाइलुन फाइलुन है 

आदमी के मुखोटे पे परतें कई,

बेखबर देखता आइना रह  गया

 

Comment by Ravi Shukla on June 7, 2017 at 2:06pm

आदरणीय बसंत जी बहुत बढि़या गजल कही है आपने शेर दर शेर मुबारक बाद कुबूल करें । गजल से पहल बह्र लिखने में शायद भूल हो गई है । इसकी बहर फाइलुन फाइलुन फाइलुन फाइलुन है । तीसरे शे का उला मिसरा फिर से देख लें बहर में नही है । सादर

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on June 7, 2017 at 11:29am
आदरणीय बसन्त जी,हारदिक बधाई स्वीकारें इस उम्दा गजल के लिए!

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