For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

हम पत्थर को अपना बैठे (छोटी बह्र पर ग़ज़ल 'राज')

२ २ २ २  २ २ २ २

हम अपनों को बिसरा बैठे

गम पास हमारे आ बैठे

 

 जलने की तमन्ना थी दिल में

सूरज को हाथ लगा बैठे

 

तुम शाद रहो आबाद रहो

हम तो दिल को फुसला बैठे

 

जब दुनिया में इंसा न मिला

हम पत्थर को अपना बैठे

 

कश्ती ने  हाथ बढ़ाया जब

 हम दूर किनारे  जा बैठे

 

कैसा शिकवा कैसा गुस्सा

किस्मत से हाथ मिला बैठे

 

गिर्दाब बनाया  हमने जो                                                                                                                                              उसमे खुद नाव डुबा  बैठे 

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Views: 648

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on June 14, 2017 at 12:39pm

मुहतर्मा राजेश कुमारी साहिबा , आपके मिसरों की बह्र मेरे हिसाब से यह है
हम अपनों को बिसरा बैठे ------बह्र हिन्दी ,मुतक़ारिब असरम मक़बूज़ महज़ूफ (फेलुन ,फेलुन,फेलुन,फेलुन)
गम पास हमारे आ बैठे -------------
मिलने की तमन्ना दिल में थी -------बह्र ज़मज़मा ,मुतदारिक मर्बाअ मुज़ायफ (फेलुन ,फइलुन ,फेलुन,फेलुन )
आपकी ग़ज़लमें यह दो बह्र हैं , लय के हिसाब से आप खुद देख लीजिए ,लगा ,मिला और डुबा क़ाफ़िया दूसरी
बह्र में तो आएगा मगर पहली बह्र में नहीं आएगा \ आपके मत्ले के दोनो मिसरों की बह्र अलग अलग है,
मेरे ख़याल से आप समझ गई होंगी ---सादर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 14, 2017 at 9:17am

मुह्तरम  तस्दीक जी ,आपका बहुत बहुत शुक्रिया |आपने शेर दर शेर अपने हिसाब से विश्लेषण किया है उसकी शुक्रगुजार हूँ .

पहले तो ये बह्र --मुतदारिक मुसम्मिन मखबून मकतूअ ---ही बहुत कन्फयूजिंग है इसमें मिली छूट के विषय  में भी  अलग अलग राय हैं कोई १२१ से भी शुरू करता है जिसको मैंने कभी नहीं लिया २११ या १२२ करने की भी छूट  है  एसा बहुत जगह पढ़ा है ऐसी गज़लें लय प्रधान होनी जरूरी हैं अब देखिये आपने जो इस्स्लाह दी है -हम अपनों को बिसरा बैठे 
गम पास हमारे आ बैठे  को आपने कहा ----              पास हमारे गम आ बैठे ----इसमें लय आ ही नहीं रही है  इसी तरह अन्य मिसरे भी  हैं ---जलने की तमन्ना थी दिल में ------जलने की थी दिल में तमन्ना इसमें भी लय नहीं बनती 

अब एक बड़े शायर का उदाहरण इसी बह्र पर कोट करूंगी उसे देखिये ---फिर से शिल्प नया घड़ने को ,हाथ नया पत्थर माँगेगा

दूसरे मिला और लगा काफिया क्यूँ नहीं हो सकते इस पर भी संशय है आप थोड़ा समझाइये .

मैंने इस ग़ज़ल को लय  के हिसाब से बांधा है  आप ग़ज़ल को मुझसे बेहतर जानते हैं हो सकता आपकी बातें ठीक हों किन्तु उस हिसाब से लय ही नहीं आ पा रही है .यदि ग़ज़ल पर ये प्रस्तुति खरी नहीं उतरती तो इसे नज्म ही रहने दूँगी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 14, 2017 at 9:00am

आद० मुहम्मद आरिफ जी ,आपको ये ग़ज़ल पसंद आई तहे दिल से शुक्रिया .

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on June 13, 2017 at 9:11pm

मुहतर्मा राजेश कुमारी साहिबा, छोटी बह्र में अच्छी ग़ज़ल हुई है ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएँ
लगता है ग़ज़ल में ज़्यादा वक़्त नहीं दे सकीं हैं ,कई मिसरे बह्र में नहीं ,देख लीजिएगा

हम अपनों को बिसरा बैठे
गम पास हमारे आ बैठे -----पास हमारे गम आ बैठे
जलने की तमन्ना थी दिल में ------जलने की थी दिल में तमन्ना
सूरज को हाथ लगा बैठे -----पास शम्श के हम जा बैठे (लगा क़ाफ़िया नहीं होगा )
तुम शाद रहो आबाद रहो -----शाद रहो आबाद रहो तुम
जब दुनिया में इन्सा न मिला ----जब दुनिया में मिला न इन्सा
कश्ती ने हाथ बढ़ाया जब --------जब कश्ती ने हाथ बढ़ाया
हम दूर किनारे जा बैठे -------दूर किनारे हम जा बैठे
क़िस्मत से हाथ मिला बैठे -----क़िस्मत को हम अपना बैठे (मिला क़ाफ़िया नहीं होगा )
गिर्दाब बनाया हम ने जो ------जो गिर्दाब बनाया हम ने
उसमें खुद नाव डूबा बैठे -----नाव वहीं पर हम ला बैठे (डूबा क़ाफ़िया नहीं होगा )
सादर

Comment by Mohammed Arif on June 13, 2017 at 6:45pm
आदरणीया राजेश कुमारी आदाब,नन्ही बह्र वाली प्यारी-सी ग़ज़ल के लिए शे'र दर शे'र मुबारकबाद क़ुबूल करें । बाक़ी रामबली गुप्ता जी बता चुके हैं ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 13, 2017 at 5:56pm

आद० बसंत कुमार जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 13, 2017 at 5:56pm

आद०  रामबली जी ,आपको ग़ज़ल अच्छी लगी इस लिए भी शुक्रिया गलती पर ध्यान दिलाया उसका भी शुक्रिया दरअसल दो जगह ये ग़ज़ल थी जो ड्राफ्ट था वो गलती से पोस्ट हो गई जो फाइनल थी जो अन्य जगह पोस्ट की वो सही वाली थी इसे अभी संशोधित करती हूँ 

गम पास हमारे आ बैठे ही था मूल पोस्ट  में तथा जलने की तमन्ना थी दिल में ,सूरज को हाथ लगा बैठे मिसरा इस तरह था |

Comment by बसंत कुमार शर्मा on June 13, 2017 at 4:20pm

बहुत खूबसूरत ग़ज़ल , वाह वाह 

Comment by रामबली गुप्ता on June 13, 2017 at 4:03pm
बहुत ही अच्छी ग़ज़ल हुई है आदरणीया बहन राजेश कुमारी जी हार्दिक बधाई स्वीकारें।
कुछ जगहों पर मुझे लय उतनी बनती हुई नही लगी हालांकि शिल्प से सही है।
जैसे मतले को लें तो सानी में
'पास हमारे गम आ बैठे'
के स्थान पर
'गम पास हमारे आ बैठे'
रखने पर बेहतर लय बन रही है।
इसी प्रकार पहले शैर को यूँ कहने पर बेहतर लय हो रही है-
थी दिल में हसरत जलने की,
सूरज को हाथ लगा बैठे।
चौथा और अंतिम शैर मुझे प्रवाह के दृष्टिकोण से सबसे अच्छे लगे।पुनश्च बधाई। इस प्रकार के वह्र में प्रवाह ही महत्वपूर्ण होता है।सादर

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

Ashok Kumar Raktale commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post देवता चिल्लाने लगे हैं (कविता)
"   आदरणीय धर्मेन्द्र कुमार सिंह जी सादर, धर्म के नाम पर अपना उल्लू सीधा करती राजनीति में…"
5 hours ago
Ashok Kumar Raktale commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post न पावन हुए जब मनों के लिए -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"   हमारे बिना यह सियासत कहाँजवाबों में हम हैं सवालों में हम।३।... विडम्बना…"
5 hours ago
Ashok Kumar Raktale commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ
"   सूर्य के दस्तक लगानादेखना सोया हुआ है व्यक्त होने की जगह क्यों शब्द लुंठितजिस समय…"
5 hours ago
Ashok Kumar Raktale commented on vijay nikore's blog post सुखद एकान्त है या है अकेलापन
"      तरू तरु के पात-पात पर उमढ़-उमढ़ रहा उल्लास मेरा मन क्यूँ उन्मन क्यूँ इतना…"
5 hours ago
Ashok Kumar Raktale commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . क्रोध
"आदरणीय सुशील सरना साहब सादर, क्रोध विषय चुनकर आपके सुन्दर दोहावली रची है. हार्दिक बधाई स्वीकारें.…"
5 hours ago
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post ग़ज़ल
"  आदरणीय सुशील सरना साहब सादर, प्रस्तुत ग़ज़ल पर उत्साहवर्धन के लिए आपका दिल से शुक्रिया.…"
5 hours ago
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post ग़ज़ल
"   आदरणीय भाई लक्षमण धामी जी सादर, प्रस्तुत ग़ज़ल की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार.…"
5 hours ago
Sushil Sarna commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post सच काफिले में झूठ सा जाता नहीं कभी - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"वाह बहुत सुंदर प्रस्तुति हुई है आदरणीय लक्ष्मण धामी जी । हार्दिक बधाई "
6 hours ago
Sushil Sarna commented on Ashok Kumar Raktale's blog post ग़ज़ल
"वाहहहहहह आदरणीय क्या ग़ज़ल हुई है हर शे'र पर वाह निकलती है । दिल से मुबारकबाद कबूल फरमाएं…"
6 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Ashok Kumar Raktale's blog post ग़ज़ल
"आ. भाई अशोक जी, सादर अभिवादन।बहुत सुंदर समसामयिक गजल हुई है। बहुत बहुत हार्दिक बधाई।"
8 hours ago
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

ग़ज़ल

   ग़ज़ल2122  2122  212 कितने काँटे कितने कंकर हो गयेहर  गली  जैसे  सुख़नवर हो गये रास्तों  पर …See More
9 hours ago
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . क्रोध

दोहा पंचक. . . . क्रोधमानव हरदम क्रोध में, लेता है प्रतिशोध ।सही गलत का फिर उसे, कब रहता है बोध…See More
13 hours ago

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service