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हृदय-सम्बन्ध .... क्षणिकाएँ

१.

अर्थहीन प्रश्नों के

चकरदार अर्थ

अर्थहीन न तो क्या होंगे

घेर लेते हैं मुझको

छेड़ी हुई मधुमक्खियों की तरह

अब मुंद जाने दो आँखें

बन्द कर दो किवाड़

             -----

२.

कोमल पत्तों पर अटकी

प्रांजल बूँदें ...

अपनी ही गढ़ी हुई 

वेदना का विस्तार

शायद ... तुम ...

मन के गहरे में कुछ

पल्लवित होना चाहता है

            -----

३.

कभी ऐसा भी तो होता है 

सूर्य के पड़ोस में

बारिश की बूँदें

कितनी शीतल, कितनी भंगुर

सूख-सूख सोखती हैं दर्द को ...

रह जाएगा सूर्य का एकाकीपन अकेला

भड़क-भड़क वह जलता रहेगा

                -----

४.

एकान्त तो

एक ही सुखद था

घिरती शाम की लालिमा में

तुम्हारे स्वरों की

तुम्हारी साँसों की अनुगूँज

            -----

-- विजय निकोर

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Comment by narendrasinh chauhan on July 3, 2017 at 5:07pm

लाजवाब  प्रस्तुति के लिए  दिल से ढेरों बधाई स्वीकार करें

Comment by Sushil Sarna on July 3, 2017 at 4:00pm

वाह आदरणीय विजय निकोर जी  ... शब्द असहाय हो रहे हैं  ... अंतर्नाद को आपने कितनी खामोशी से स्वरों में बाँध दिया  ... मानो सिंधु तीर पर भाव शब्दों का रूप धार स्वयं की कम्पन्न से अव्यक्त को व्यक्त करना चाहते हूँ  ... अप्रतिम अप्रतिम अप्रतिम सर  ... हृदयतल से बधाई संग नमन स्वीकार करें सर। 

Comment by Samar kabeer on July 3, 2017 at 12:30pm
जनाब भाई विजय निकोर जी आदाब,बहुत ख़ूब वाह, हर क्षणिका अपने आप में एक पूरी किताब समेटे हुए है, कितनी आसानी से आप अपने विचारों को कविता में ढाल लेते हैं,और उन विचारों की गहराई और गम्भीरता पाठक को अनदेखी जंजीरों में बांध लेती है,इस बहतरीन प्रस्तुति पर दिल से ढेरों बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Mohammed Arif on July 3, 2017 at 10:49am
आदरणीय विजय निकोर जी आदाब, बेहतरीन बिम्बों और प्रतीकों से आप्लावित हृदय के अंतस से सहज अनुभूति बनकर निकली कविताएँ । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

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