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कैसे कहूँ अब तुझसे कुछ कहा भी नहीं जाता,

कैसे कहूँ अब तुझसे कुछ कहा भी नहीं जाता,
तनहा ज़िंदगी में अब यूँ रहा भी नहीं जाता

चले थे जिस मोड़ तलक इस सफ़र में हम ,
रास्ता उस सफ़र का भुलाया भी नहीं जाता

उठता हैं मेरे दिल में तिरी यादों का तूफ़ाँ भी,
हादसा था जैसे ये भुलाया भी नहीं जाता

सुख गये यूँ अश्क़ भी यादों से तिरी,
ग़मों को लिये अब तो रोया भी नहीं जाता

तुम रहो कहीं भी मगर ये सच है ,
वजूद तिरा दिल से फिर मिटाया भी नहीं जाता

वो शख़्स जिसने मुझे अपना माना ही नहीं"संतोष"
उस शख़्स को दिल से भुलाया भी नहीं जाता
#संतोष
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
*****************************

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Comment by santosh khirwadkar on August 14, 2017 at 3:19pm
शुक्रिया आदरणीय नरेंद्र जी ....नवाज़िश!!
Comment by santosh khirwadkar on August 14, 2017 at 3:18pm
आदरणीय रवि जी , सर्वप्रथम अनुशासन उल्लंघन के लिये मंच से सार्वजनिक रूप में क्षमा!!
अभी प्रशिक्षु हूँ..आप जैसे कलावंतों/जानकार लोगों के सानिध्य की गुज़ारिश है ! प्रयत्न कर रहा हूँ कि कुछ सीख सकूँ!!
आभार
Comment by Ravi Shukla on August 14, 2017 at 3:07pm

आदरणीय संतोष जी आपने जो रचना प्रस्‍तुत की है उसका फार्मेट तो गजल जैसा लग रहा है पर आपने इसकी बहर क्‍या ली है ये नहीं लिखा मंच पर गजल से पहले उसका अरकान लिखने का अनुशासन है जिससे सीखने में आसानी हो  । आ का काफिया हो कर भी मतले के बाद वाले अशआर में सभी में या की तुकांत के शब्‍द है जबकि गजल में प्रयास ये होना चाहिये कि काफिया के अल्‍फाज ही दोहराए न जाएं । आप इस विधा के प्रति गंभीर हो तो मंच पर गजल की कक्षा और गजल की बातें ग्रुप है उनमे विस्‍तार से बाते कही गई है उनका लाभ ले सकते है आप । सादर

Comment by narendrasinh chauhan on August 14, 2017 at 1:21pm

लाजवाब 

Comment by santosh khirwadkar on August 11, 2017 at 7:03pm
शुक्रिया आदरणीय सुरेश जी ...
Comment by सुरेश अग्रवाल on August 11, 2017 at 5:47pm
शानदार,,,वाहह

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