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नज़र की हदों से .....

नज़र की हदों से .....

अग़र
तेरे बिम्ब ने
मेरे स्मृति पृष्ठ पर
दस्तक
न दी होती
मैं कब का
तेरी नज़र की
हदों से
दूर हो गया होता

शायद
रह गया था
कोई क्षण
अधूरी तृषा लिए
तृप्ति के
द्वार पर
अगर
तेरी तृषा के
स्पंदन ने
मेरी श्वासों को
न छुआ होता
सच
मैं कब का
तेरी नज़र की
हदों से
दूर हो गया होता

शायद
लिपटा था
कोई मूक निवेदन
अपनी हथेली पर
एकांत में बीते
मधुर संवेदनाओं की
बिखरी किर्चियाँ लेकर
मेरे क़दमों से
एक याचक सा

सच मानो
अगर तुमने
तुमने मेरे पथ को
अपनी विरह गंध से
पोषित न किया होता
मैं कब का
तेरी नज़र की
हदों से
दूर हो गया होता

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Sushil Sarna on August 19, 2017 at 4:50pm

आदरणीय सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' जी सृजन को मान देने का हार्दिक आभार। 

Comment by नाथ सोनांचली on August 18, 2017 at 5:06am
जनाब सुशील सरना जी सादर,बहुत उम्दा कविता लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Sushil Sarna on August 16, 2017 at 4:57pm

आदरणीया कल्पना भट्ट जी सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna on August 16, 2017 at 4:57pm

आदरणीय मो.आरिफ साहिब, आदाब, सृजन को अपने स्नेह से प्रोत्साहित करने का हार्दिक आभार।

Comment by Sushil Sarna on August 16, 2017 at 4:57pm

आदरणीय समर कबीर साहिब, आदाब, सृजन के मर्म को अपनी स्नेहिल प्रशंसा से अलंकृत करने का दिल से आभार। इंगित त्रुटि को मैंने दुरुस्त कर दिया है। । आपके सुझाव का दिल से आभार। 

Comment by Sushil Sarna on August 16, 2017 at 4:57pm

आदरणीय रवि शुक्ला जी सृजन के भावों को अपनी स्नेहाशीष से उत्साहित करने का हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on August 16, 2017 at 4:57pm

आदरणीय नरेंद्र सिंह चौहान जी सृजन को मान देने का हार्दिक आभार।

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 16, 2017 at 4:47pm

बहुत सुंदर भावपूर्ण रचना है , आदरणीय मैं आदरणीय समर भाई जी से सहमत हूँ | सादर | हार्दिक बधाई आपको इस रचना के लिए 

Comment by Mohammed Arif on August 15, 2017 at 8:12pm
आदरणीय सुशील सरना जी आदाब, बेहतरीन भावों की गीतांजलि । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।आली जनाब मोहतरम समर कबीर साहब की बात पर गौर करें ।
Comment by Samar kabeer on August 15, 2017 at 12:06pm
जनाब सुशील सरना जी आदाब,बहुत उम्दा कविता लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।
कुछ पंक्तियों में 'तुमने'और कुछ में 'तेरी' शब्द कविता को कमज़ोर कर रहा है,देखियेगा ।

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