For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

१२२ १२२ १२२ १२२

नहीं है यहाँ पर मुझे जो बता दे
सही रास्ता जो मुझे भी दिखा दे

ये कैसी हवा जो चली है यहाँ पर
परिंदा नहीं जो पता ही बता दे

चले थे कभी साथ साथी हमारे
पुरानी लकीरों से यादें मिटा दें

कभी तो मिलेगी ज़िन्दगी पुरानी
वफ़ा की ज्वाला यहाँ भी जला दे

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Views: 886

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on August 27, 2017 at 12:30pm
बहुत ही खूबसूरत प्रयास है आदरणीया...बधाई
Comment by narendrasinh chauhan on August 26, 2017 at 5:24pm

बहोत खूब 

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 25, 2017 at 9:57pm

जी आदरणीय सलीम रज़ा जी ,  प्रयासरत हूँ इसको बदल सकूँ | सादर धन्यवाद् आपका |

Comment by SALIM RAZA REWA on August 25, 2017 at 9:36pm
कल्पना जी ग़ज़ल के लिए बधाई,
आखिरी शेर का पहला मिसरा बे बहर हो रहा है एक बार पुनः देख लें.
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 25, 2017 at 5:55pm

आपको परेशां होना पड़ा मेरी वजह से क्षमा चाहती हूँ भाई जी |

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 25, 2017 at 5:48pm

नमस्ते आदरणीय समर भाई जी , आपने देख ली यही बहुत है , मुझे पता है आप तरही में व्यस्त होंगे , भाई जी लिखते वक़्त आप ही याद आ रहे थे , और दूसरी और आदरणीय रवि शुक्ल जी , भाई जी जो गलतियाँ हुई है कल प्रयास किया था की समझ पाऊं पर नहीं समझ आई फिर लगा पोस्ट कर देती हूँ ज्यादा से ज्यादा गलत ही होगी , और अच्छा है न जब सीखना है तो सही हो जाने पर गुमान हो जायेगा , जो मुझे सीखने नहीं देगा और ऐसा मैं होने न दूंगी | सादर |

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 25, 2017 at 2:31pm
Sadar dhanywad adarniya Ravi sir.
Comment by Samar kabeer on August 25, 2017 at 2:25pm
बहना कल्पना भट्ट जी आदाब,मुग्ध हूँ आपके इस प्रयास पर,बहुत उम्दा ग़ज़ल कही आपने,बह्र भी ख़ूब निभाई है,ग़लतियां तो उनसे भी होती हैं जो सबकुछ जानते हैं,इसलिये इसकका होना स्वाभाविक है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
हालांकि इस वक़्त ब्लाग्स पर मेरा आना मुश्किल था,क्योंकि मंच पर तरही मुशायरा चल रहा है,लेकिन आपकी वजह से आना ही पड़ा, ख़ैर ।
तीसरे शैर में रदीफ़ 'दें',को "दे" कर लें ।
आख़री शैर का ऊला मिसरा लय में नहीं यूँ कर लें :-
'कभी तो मिलेगा हमें कोई ऐसा'
कुछ अशआर में थोड़ा काम और है, बाद में हाज़िर होता हूँ ।
Comment by Ravi Shukla on August 25, 2017 at 1:45pm
आदरणीया कल्पना जी आपके सद्प्रयास को देख कर बहुत ही खुशी हुई बहुत बहुत बधाई आपको। निरंतरता बनाएं रखे आप जल्दी ही तरही मुशरों में शिरकत करेंगी हमें ये उम्मीद हो गई है ।
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 25, 2017 at 10:51am
Ji aadarniya Shahzad bhai mai bhi margdarshan ke liye intezaar kar rahi hoon ..Ho sakta hai galat likhi ho.. sadar dhanywad

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sushil Sarna commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post दोहे -रिश्ता
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी रिश्तों पर आधारित आपकी दोहावली बहुत सुंदर और सार्थक बन पड़ी है ।हार्दिक बधाई…"
yesterday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-120
"तू ही वो वज़ह है (लघुकथा): "हैलो, अस्सलामुअलैकुम। ई़द मुबारक़। कैसी रही ई़द?" बड़े ने…"
Monday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-120
"गोष्ठी का आग़ाज़ बेहतरीन मार्मिक लघुकथा से करने हेतु हार्दिक बधाई आदरणीय मनन कुमार सिंह…"
Monday
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-120
"आपका हार्दिक आभार भाई लक्ष्मण धामी जी।"
Monday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-120
"आ. भाई मनन जी, सादर अभिवादन। बहुत सुंदर लघुकथा हुई है। हार्दिक बधाई।"
Monday
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-120
"ध्वनि लोग उसे  पूजते।चढ़ावे लाते।वह बस आशीष देता।चढ़ावे स्पर्श कर  इशारे करता।जींस,असबाब…"
Sunday
Admin replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-120
"स्वागतम"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-177
"आ. रिचा जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए आभार।"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-177
"आ. भाई अजय जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए आभार।"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-177
"आ. भाई चेतन जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए आभार।"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-177
"आ. भाई अमीरुद्दीन जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए आभार।"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-177
"आ. भाई अमित जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए धन्यवाद।"
Saturday

© 2025   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service