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बस खचाखच भरी हुई थी। चुकि मैं पहले आ गया था, इसलिए मुझे सीट मिल गयी थी, बावजूद इसके भीड़ का असर मुझ पर भी हो रहा था।

यकायक मेरी नजर एक ऐसे शख्स पर गयी, जो मुझे बचपन के दिनों में गणित पढ़ाया करते थे। वे भी बस में खड़े खड़े भीड़ के दबाव को झेल रहे थे। लगभग 30 साल पहले, एक हृष्ट पुष्ट युवा को आज एक कमजोर असहाय बुजुर्ग के रूप में देखकर पहले पहचानने में थोड़ी असहजता हुई पर ध्यान से देखने पर मैं उन्हें भली भांति पहचान गया ।

मैं उठा और प्रणाम कर अपनी सीट पर उन्हें बैठने का आग्रह किया। मेरी सदाशयता पर वो भावुक हुए, उन्होंने मेरे चेहरे की तरफ कई बार देखा और मुझे पहचानने की कोशिश की, पर शायद पहचान नहीं पाए।

उनकी असमंजसता को दूर करने के लिए मैं ही पूछ बैठा-"गुरुजी! क्या आप मुझे नहीं पहचाने?

गुरुजी बोले- "चेहरा तो कुछ जाना पहचाना सा लग रहा है, पर सच यही है कि मैं आपको पहचान नहीं पा रहा हूँ।

'गुरुजी मैं आपका एक भूतपूर्व शिष्य हूँ। जब मैं पाँचवी कक्षा में था तो आप ही मुझे गणित पढ़ाया करते थे।' गुरुजी की बात को लगभग बीच मे काटते हुए मैं बोल पड़ा।

गुरुजी मुस्कुराये और बोले-"बेटा शिष्य कभी भूतपूर्व नहीं होता। शिष्य सदैव अभूतपूर्व होता है। आदमी कितना भी बड़ा क्यों न हो जाये, चाहे उम्र में या कद में। वह गुरु के लिए हमेशा ही उसका शिष्य ही होता है।"

मैं अपनी नासमझी पर लज्जित हो उनकी बातें उसी तरह सुनने लगा जैसे बचपन मे कभी सुना करता था।

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Samar kabeer on September 5, 2017 at 2:23pm
जनाब सुरेन्द्र नाथ सिंह जी आदाब,लघुकथा का प्रयास अच्छा है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।
Comment by नाथ सोनांचली on September 5, 2017 at 1:17pm
आभार भाई आद0 मोहम्मद आरिफ जी। आपके प्रोत्साहन से ऊर्जा मिलती है। सादर
Comment by Mohammed Arif on September 5, 2017 at 11:23am
आदरणीय सुरेंद्रनाथ जी आदाब, लघुकथा का प्रयास आश्वस्ति कारक है । बधाई स्वीकार करें ।

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