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22 22 22 22
मैंने दिल की बात कही है
उनको लगती खूब खरी है।1

मंदिर-मंदिर भटके हैं सब
बाबाओं की धूम मची है।2

दाढ़ी ने है नाच नचाया
जब-जब लक्ष्मी हाथ लगी है।3

कितने डेरे उजड़े अबतक
डेरों की सरकार चली है।4

भूखे-नंगे बढ़ते जाते
भक्तों की बारात सजी है।5

चुनकर जाते जो संसद में
लगता उनकी साँस टँगी है।6

निर्वाचक ऊँघते, परते हैं
जात-धरम की खाट पड़ी है।7

न्याय बड़ा डंडाधारी है
ले-देकर यह आस बची है।8

आज अदीबों की मति कुंठित
देख तमाशा मूक बनी है।9
@मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by Manan Kumar singh on September 5, 2017 at 7:18pm
आदरणीय लक्ष्मण जी,आपका आभारी हूँ।
Comment by Manan Kumar singh on September 5, 2017 at 7:17pm
आ.महेंद्र जी,आपका आभार।
Comment by Manan Kumar singh on September 5, 2017 at 7:17pm
जनाब समर जी आदाब,शुक्रिया।अभी तो दरबार और दाढ़ी की ही धूम मची है,सादर।
Comment by Manan Kumar singh on September 5, 2017 at 7:16pm
आदरणीय आरिफ जी,आपका शुक्रिया।
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 5, 2017 at 4:10pm
हार्दिक बधाई आ. भाई मनन जी ।
Comment by Mahendra Kumar on September 5, 2017 at 4:05pm

आ. मनन जी, समसामयिक परिप्रेक्ष्य को केन्द्र में रखते हुए बहुत ही बढ़िया ग़ज़ल कही है. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. आ. समर सर की तरह तीसरे शेर का भाव मुझे भी समझ में नहीं आया. सादर.

Comment by Samar kabeer on September 5, 2017 at 2:16pm
जनाब मनन कुमार सिंह जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।
3रे शैर का भाव समझ नहीं पाया ?
Comment by Mohammed Arif on September 5, 2017 at 11:18am
आदरणीय मनन कुमार जी आदाब, बहुत ही बेहतरीन ग़ज़ल । शेर दर शेर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल कीजिए । बाक़ी गुणीजन अपनी राय देंगे ।

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