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अपने-पराये(लघुकथा)राहिला

"तुम्हारी सारे फैसलों से मैं हमेशा सहमत रहा हूँ । लेकिन आज इस फैसले से मैं कतई सहमत नहीं।आख़िर मेरी गैरहाजिरी में ऐसा क्या हुआ कि अचानक तुमने वहां वापसी की ज़िद पकड़ ली?बड़ी भाभी या सुषमा ,किसी ने कुछ कहा क्या?"

"...."

" कुछ तो बोल बिट्टो! क्या तू भूल गयी उन लोगों ने तेरे साथ कितना गलत किया था?"
" नहीं ..,कुछ नहीं भूली, लेकिन ये भी याद है कि इन सब के बाद वह अपने व्यवहार पर शर्मिंदा भी हुए थे!"उसने सपाट भाव से उत्तर दिया।
"तू !पागल हो गयी है? कुत्ते की पूंछ कभी सीधी हुई है जो तू उसके बहकावे में आ गयी।तुझे हमने राजकुमारियों की तरह पाला है।और कोई तुझ पर जुल्म करे ,ये हमें कतई बर्दाश्त नहीं ।
भाई के मन में अपने लिए प्यार और फिक्र देखकर कर उसकी आंख भर आयी।कुछ देर की गहरी चुप्पी के बाद खुद को संयत करते हुए वह बोली-
"भाई एक कहानी सुनाऊँ।"
"...?"ऐसी बेवक़्त की बात सुन सुबोध चौंक उठा। लेकिन इतना जरूर समझ गया कि बात साधारण नहीं है। उसने कार में चल रहे एफएम को बंद कर दिया।
शीशे से बाहर देखते हुए उसने शुरू किया।
"परोपकार और अहिंसा का प्रचार -प्रसार कर रहे एक महात्मा को वहाँ की असहमत जनता ने क्रुद्ध होकर बंधक बना लिया ।और समाज़ के कुछ ग़द्दावर ठेकेदारों ने उन्हें संगसार करने की सजा सुना दी ।उन महात्मा के साथ उनका एक शिष्य भी था ,लेकिन भाग्य से वह उस समय साथ ना होने के वह कारण बच गया। थोड़ी देर बाद जब वह लौटा तो उसने अपने गुरु को पेड़ से बंधा पाया ।लोगों के हाथ में पत्थर थे ।एक जल्लाद किस्म के आदमी ने उपस्थित सभी लोगों को पत्थर मारने का आदेश दिया।नरमी दिखाने वाले को भी सख्त सज़ा थी ।ऐसे में शिष्य बड़े असामंजस्य में पड़ गया कि कैसे अपने गुरु को पत्थर मारने का पाप अपने सिर ले। यदि ऐसा नहीं करता तो खुद लिए मुसीबत खड़ी थी।आदेशानुसार लोगों ने पत्थर मारने शुरू कर दिये ,लेकिन आश्चर्य!इतनी चोटों के बाबजूद महात्मा के चेहरे पर शिकन तक नहीं पड़ी। यहाँ शिष्य ने भीड़ का फायदा उठाया,और अपने गुरु से नजरें चुराते हुए ,पत्थर की जगह एक फूल फेंक कर मारा ।महात्मा की नज़र अपने शिष्य पर ही थी ।फूल की मार पड़ते ही महात्मा फूट-फूट कर रो पड़े।
पता है भैया!ये कहानी बचपन में सुनी थी।
तब मुझे यह समझ नहीं आया कि महात्मा फूल की मार से क्यों रो दिए थे ,जबकि पत्थरों की चोट पर उन्होंने उफ तक नहीं की थी।आज उस कहानी का मर्म समझ पायी हूँ ।" कार रुकी और नम आँखों से विभा
ससुराल की ड्योढ़ी पर उतर गई।

मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Rahila on October 15, 2017 at 8:25pm
बहुत शुक्रिया आदरणीय सुनील सर जी! सादर
Comment by Rahila on October 15, 2017 at 8:24pm
बहुत शुक्रिया प्रिय कल्पना दी!प्रिय नीता दीदी!और आदरणीया राजेश दीदी!आप सब का बहुत आभार ।सादर
Comment by Rahila on October 15, 2017 at 8:22pm
आदरणीय कबीर साहब!आदाब,बहुत शुक्रिया हौसला अफजाई के लिए।सादर
Comment by Sushil Sarna on October 11, 2017 at 7:54pm

मार्मिकता से लिपटी इस संदेशप्रद लघुकथा के लिए हार्दिक बधाई आदरणीय राहिला जी। 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 11, 2017 at 7:03pm

दूसरों के मारे पत्थर भी सहन हो जाते हैं किन्तु अपनों के तो फूलों से भी चोट लग जाती है यदि वो फूल मारे गए हों तो 

बहुत ही गहन विश्लेषण है रिश्तों का इस लघु कथा में .बहुत बहुत बधाई इस सार्थक लघु कथा के लिए प्रिय राहिला जी 

Comment by Nita Kasar on October 11, 2017 at 5:03pm
सुंदर संदेशप्रद कथा बधाई आद० प्रिय राहिला जी ।
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on October 11, 2017 at 3:37pm

अच्छी लघुकथा है आदरणीया राहिला जी | हार्दिक बधाई |

Comment by Samar kabeer on October 11, 2017 at 11:25am
मोहतरमा राहिला जी आदाब,अच्छी लघुकथा है, बधाई स्वीकार करें ।

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