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"अरे, इसे रोको तो ज़रा! कौन है यह? इस तरह कहां और क्यों दौड़ा चला जा रहा है ? कहीं यह वही 'विकास' तो नहीं?"
"नहीं!"
"तो क्या यह भी कोई 'राम' नामधारी है?"
"नहीं!"
"तो फिर कौन है यह? किसी 'राधा' का मीत?"
"नहीं, वह भी नहीं!"
"तो क्या 'गंगा' का सेवक?"
"नहीं भाई!"
"तो क्या तथाकथित 'सेवक'; जेहादी, हिन्दुत्व-प्रचारक, इस्लाम या ईसाइयत-प्रचारक?"
"नहीं, हरग़िज़ नहीं!"
"तो फिर कोई भ्रष्टाचारी, आतंकी या सब कुछ जीतने का इच्छुक कोई नया 'हिटलर'?"
"वैसा भी कोई नहीं!"
"तो फिर कौन है यह अपना साजो-सामान सा लिए हुए? कोई सताया, भगाया गया 'शरणार्थी'?"
"हां, इसे ख़ुद से और अपनों से ही पीड़ित, अपनों के ही बीच का कोई शरणार्थी कह लो या शरणार्थियों जैसे हालात वाला कोई महत्वाकांक्षी शिक्षित 'बेरोज़गार'!"

इन लोगों की बातें सुनकर देश में चल रही हवा ने कहा - "दरअसल उड़ता सा यह इंसान उन सभी का प्रतिनिधित्व कर रहा है, जिनके नाम तुमने अभी लिए; जो बावले हो गये हैं, बुद्धि भ्रष्ट कर चुके हैं!"

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 30, 2017 at 10:31pm
मेरी इस लघुकथा पर समय देकर समीक्षात्मक टिप्पणियों द्वारा प्रोत्साहित करने के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया मुहतरम जनाब डॉ. विजय शंकर जी, आदरणीय डॉ. आशुतोष मिश्रा जी, आदरणीय जवाहर लाल सिंह जी और आदरणीया कल्पना भट्ट जी।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 30, 2017 at 10:24pm
रचना पर समय देकर समीक्षात्मक टिप्पणी और सुझाव के साथ हौसला अफ़ज़ाई के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया मुहतरम जनाब महेंद्र कुमार साहिब, आदरणीया राजेश कुमारी जी और जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहिब। महत्त्वाकांक्षी शिक्षित शब्द मैंने इस्तेमाल किए थे क्योंकि ऐसे ही युवा विदेशों की ओर पलायन कर देश को नुकसान और विदेशों को अधिक लाभ पहुंचाते हैं। आम सामान्य या पिछड़े वर्ग के बेरोज़गार रोज़गार के लिए भटकता है, तड़पता है, दौड़ नहीं पाता प्रलोभनों के पीछे। यह भाव देने के लिए उस पंक्ति में क्या परिवर्तन करना चाहिए, मार्गदर्शन निवेदित।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 23, 2017 at 7:42pm

बहुत बढिया तीक्ष्ण कटाक्ष करती हुई लघु कथा मैं भी आद० महेंद्र कुमार जी की बात से सहमत हूँ महत्वाकांक्षी शब्द के स्थान पर कोई दूसरा शब्द उपयुक्त होगा | बहुत बहुत बधाई इस सुंदर लघु कथा पर |

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on October 22, 2017 at 9:08pm

तीक्ष्ण कटाक्ष तो है ही। ..आज की तस्वीर कुछ कुछ ऐसी ही बन रही है. 

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on October 22, 2017 at 8:47pm

बढ़िया कथा | शिक्षित बेरोजगार शिक्षक कहीं तो कहीं ऐसे भी शिक्षक भी हैं जिनको बेसिक नॉलेज भी नहीं पर वे पढ़ा रहे हैं | बधाई इस कथा के लिए \

Comment by Mahendra Kumar on October 22, 2017 at 9:44am

आ. शेख़ शहज़ाद उस्मानी जी, उम्दा व्यंग्यात्मक लघुकथा हुई है. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए.

//"हां, इसे ख़ुद से और अपनों से ही पीड़ित, अपनों के ही बीच का कोई शरणार्थी कह लो या शरणार्थियों जैसे हालात वाला कोई महत्वाकांक्षी शिक्षित 'बेरोज़गार'!"// यदि इस संवाद से "महत्वाकांक्षी शिक्षित" को निकाल दिया जाए अथवा इनकी जगह किसी अन्य शब्द (या शब्द समूह) को रख दिया जाए तो मुझे लगता है कि 'बेरोज़गार' के साथ-साथ आपके इस संवाद का फ़लक भी बढ़ जाएगा. देख लीजिएगा. सादर.

Comment by Dr. Vijai Shanker on October 21, 2017 at 2:10am
कथा में दम है और दमदार सन्देश भी है। पर कितने ध्यान देते हैं , प्रश्न यह है। प्रयास कठिन था , इस लिए बहुत सराहनीय है। आदरणीय शेख़ शहज़ाद उस्मानी जी , बधाई , सादर।
Comment by Dr Ashutosh Mishra on October 20, 2017 at 6:30pm
आदरणीय आपकी हर लघु कथा मैं पढता हूँ मैं शिल्प का बिशेस जानकार नहीं हूँ लेकिन यह रचना तो मेरे दिमाग में घूम रही है।बहुत ही ज्यादा पसंद आयी रचना पर हार्दिक बधाई सादर
Comment by Mohammed Arif on October 20, 2017 at 6:03pm
आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी जी आदाब, बहुत ही तीक्ष्ण कटाक्ष । बेहतरीन संवाद और पात्रानुकूल संवाद ।आज की सबसे बड़ी समस्या बेरोज़गारी है । नौजवानों को आज कोई समझने के लिए तैयार नहीं है ।डिग्रीधारी बनकर दर-दर की ठोकरे खाने पर विवश है । अच्छा ध्यानाकर्षण है । दिली मुबारकबाद क़ुबूल करें ।

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