For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

बशीर बद्र साहब की जमीन पर एक तरही ग़ज़ल

अरकान-: मफ़ाइलुन फ़्इलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन/फ़इलुन

नया ज़माना नया आफ़ताब दे जाओ
मिटा दे जुर्म जो वो इन्क़िलाब दे जाओ

हज़ार बार कहा है जवाब दे जाओ,
मैं कितनी बार लुटा हूँ हिसाब दे जाओ||

मुझे पसंद नही मरना इश्क़ में यारो,
मुझे है शौक़ नशे का शराब दे जाओ||

वो कह रहे हैं खड़े होके बाम पर मुझ से,
तमाशबीन बहुत हैं नक़ाब दे जाओ ||

करम करो ये मेरे हाल पर चले जाना
*उदास रात है कोई तो ख़्वाब दे जाओ*||

अगर जगाना है सोए हुओं को ऐ यारो,
तुम इनको इल्म की कोई किताब दे जाओ||

(मौलिक व अप्रकाशित)

Views: 1553

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Samar kabeer on October 26, 2017 at 4:25pm
पहले आप मौलिकता का अर्थ समझाएं,और ये बताएं कि तरही ग़ज़ल मौलिक क्यों नहीं होती ?
Comment by Mohammed Arif on October 26, 2017 at 3:45pm

आली जनाब मोहतरम समर कबीर साहब आदाब, मैंने अपनी टिप्पणी से किसी को भी आहत नहीं किया है और न वैसी मेरी प्रवृत्ति रही है । मैंने तो सिर्फ और सिर्फ मौलिकता की हिमायत की है । सादर ।

Comment by Samar kabeer on October 26, 2017 at 3:16pm

जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहिब आदाब,आपकी टिप्पणी और उस पर आपके ग़लत तर्क पढ़कर इंतिहाई तकलीफ़ हुई,मैं ये समझने से क़ासिर हूँ कि अचानक आपको क्या हो गया है जो आपने इस तरह की टिप्पणी दी,आपकी टिप्पणी का शिकार में भी हुआ,कि अभी मेरी ग़ज़ल 'ग़ालिब की ज़मीन में'ताज़ा ही है, आपने मेरी ग़ज़ल पर ये टिप्पणी दी होती तो मुझे इतना दुख नहीं होता,आप तो सदियों पुरानी तहज़ीब के भी ख़िलाफ़ हो गए,ये अच्छा संकेत नहीं है,मेरा आपको मश्विरा है कि आपको इसके लिए ग़ज़ल कार से और मंच से मुआफ़ी मांगना चाहिए,क्योंकि आपकी बात हर लिहाज़ से ग़लत और बे बुनियाद है ।

Comment by Mohammed Arif on October 26, 2017 at 2:55pm
आदरणीय सौरभ पांडे जी आदाब, मैंने आदरणीय नीलेश जी पहले ही पढ़ लिया है । सादर ।
Comment by SALIM RAZA REWA on October 26, 2017 at 2:55pm
सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' जी,
ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिए मुबारक़बाद.

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 26, 2017 at 1:27pm

आदरणीय आरिफ़ साहब, आपके कहे पर आदरणीय नीलेश नूर जी ने पूरी व्याख्यात्मक टिप्पणी की है. आपको समझने में सहूलियत होगी.

जिस शेर में ग़िरह लगायी जाती है, उस शेर को हटा भी दिया जाय तो पूरी ग़ज़ल तो शायर की हुई न ?

इसी विन्दु पर आपसे एक और बात साझा करता चलूँ.  ओबीओ के तरही मुशायरे में तरही मिसरे का मतले में प्रयोग करने की मनाही है. आपने सोचा है कि ऐसा क्यों है ?

वस्तुतः, मतला किसी ग़ज़ल का अभिन्न हिस्सा हुआ करता है. अगर किसी सदस्य ने अपनी ग़ज़ल के मतले में ग़िरह लगा दी तो चाह कर भी उसे हटा नहीं सकता. जबकि ग़िरह वाले शेर को वो आसानी से हटा कर पूरी ग़ज़ल को अपनी ग़ज़ल कहता हुआ कायदे से कहीं भी पढ़ सकता है.  ओबीओ के पटल पर तरही मुशायरा की जब शुरुआत हो रही थी तो यह बात संचालक महोदय, प्रधान सम्पादक महोदय आदि को अच्छी तरह से मालूम थी. इसी कारण, सदस्यों के लिए ही यह नियम बनाया गया कि तरह मिसरे का प्रयोग मतले में न किया जाय. 

  

Comment by Mohammed Arif on October 26, 2017 at 1:02pm
आदरणीय सौरभ पांडे जी आदाब,
"मैं ग़ज़ल में पूर्ण मौलिकता का पक्षधर हूँ" से आशय बिना किसी शायर के मिसरे का इस्तेमाल करते हुए ग़ज़ल कहने से है ।सादर ।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 26, 2017 at 12:54pm

// मैं ग़ज़ल में पूर्ण मौलिकता का पक्षधर हूँ //

इस कहे का क्या मतलब हुआ, भाई ? 

एक बात और, बशीर बद्र का ही सबसे मशहूर शेर है --

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो

जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए.. .........

बताते हैं कि ये निहायत ख़ूबसूरत शेर एक तरही मुशायरे की ग़ज़ल से ही है. और इसी शेर पर ग़िरह लगायी गयी है. यह सूचना चाहे सही हो या न हो, लेकिन ये रोचक तथ्य किस बात की ओर इशारा करता है ? .. 

Comment by Mohammed Arif on October 26, 2017 at 12:15pm

आदरणीय निलेश जी,आदरणीय अफरोज़ सहर जी, आदरणीय शिज्जू शकूर जी, आदरणीय सौरभ पांडे जी आदाब,
मैंने अपना मंतव्य ग़ज़ल में ज़ियादा से ज़ियादा मौलिकता लाने के लिहाज से प्रकट किया था । मैं ग़ज़ल में पूर्ण मौलिकता का पक्षधर हूँ । सादर ।

Comment by Afroz 'sahr' on October 26, 2017 at 12:03pm
मोहतरम आरिफ़ साहिब इस विषय पर मेंरा मत जनाब सौरभ पांडे साहिब और जनाब शिज्जू शकूर साहिब के साथ है। सादर,,,

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity


सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to जगदानन्द झा 'मनु''s discussion गजल in the group मैथिली साहित्य
"आदरणीय जगदानन्द झा मनु जी, अहाँ बड्ड नीक गजल पठेलियै. सबसे पहिल, त हम प्रयुक्त भेल बहरक विषय में…"
Aug 18
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत हरिगीतिका छंद पर आपकी प्रतिक्रिया से सृजन सफल हुआ है. आपके…"
Aug 15
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"आदरणीय श्याम नारायण वर्मा जी सादर, प्रस्तुत छंदों पर उत्साहवर्धन के लिए आपका हार्दिक आभार.…"
Aug 15
जगदानन्द झा 'मनु' added 2 discussions to the group मैथिली साहित्य
Aug 10
Shyam Narain Verma commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"नमस्ते जी, बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति, हार्दिक बधाई l सादर"
Aug 6

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"  आदरणीय अशोक भाईजी, श्रावण मास का आज प्रथम सोमवार है. ऐसे पवित्र दिवस पर आप द्वारा प्रस्तुत…"
Aug 3

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on रोहित डोबरियाल "मल्हार"'s blog post दास्तां
"आदरणीय रोहित डोबरियाल "मल्हार" जी, आपकी भावुक प्रस्तुतीकरण का स्वागत है.  आप…"
Aug 3

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on vijay nikore's blog post सांकल मन के द्वार पर
"  निर्निमेष आँखों की प्रतीक्षा उत्कट तीव्रता के साथ शाब्दिक हुई है, आदरणीय विजय निकोर…"
Aug 3

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"वाह वाह वाह .. सावन की कजरी का आधुनिक रूप गुदगुदा गया, आदरणीय आशीष जी.  सही भी है, प्रकृति के…"
Aug 3
आशीष यादव replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय श्री अशोक कुमार जी इस कजरी पर टिप्पणी के लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद।  आज के परिवेश…"
Jul 27
Ashok Kumar Raktale replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय आशीष यादव जी सादर, सावन की सुंदर और मधुर  फुहारों में यह कजरी की प्रस्तुति  बहुत…"
Jul 27
vijay nikore posted a blog post

सांकल मन के द्वार पर

सांकल मन के द्वार परजब-जब जहाँ कहीं फूल खिलेयाद तुझे किया था हमने ...कहती थी न ..."क्या...तुम्हारे…See More
Jul 27

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service