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हरेक ज़ुल्म गुनाह-ओ- ख़ता से डरते हैं - सलीम रज़ा रीवा ( ग़ज़ल )

  • 1212 1122 1212 22
    -
    हरेक ज़ुल्‍म गुनाह-ओ- ख़ता से डरते हैं.
    जिन्हे है ख़ौफ़-ए-ख़ुदा वो ख़ुदा से डरते हैं 
    -
    न मुश्किलों से न जौर-ओ-जफ़ा से डरते हैं.
    ग़म-ए-हयात की  काली घटा से डरते हैं 
    -
    किसी ग़रीब की मुझको न आह लग जाए.
    इसीलिए तो हरिक बद्दुआ से डरते हैं
    -
    बड़ा सुकून  है चैन-ओ-क़रार है दिल को.
    बदलते दौर की आब-ओ-हवा से डरते हैं 
    -
    जिन्हे ख़बर ही नहीं इश्क़ भी इबादत है.
    वही तो प्यार- मुहब्बत वफ़ा से डरते हैं
    -
    ये छीन लेती है सब्र-ओ-क़रार का आलम.
    किसी हसीन की  काफ़िर-अदा से डरते हैं
    -
    ख़ता-मुआ'फ़ तो होती है जानते हैं रज़ा.
    किसी  गुनाह कि हम इंतिहा  से डरते है
    ............
    मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by SALIM RAZA REWA on November 13, 2017 at 8:52am
आदरणीय प्रदीप कुमार जी,
आप सही कह रहे हैं, बेटे ने दूसरा मिसरा पेस्ट कर दिया था सुधार हो गया है, देखिएगा, आपकी मुहब्बातो नवाज़िश के लिए शुक्रिया.
Comment by anamika ghatak on November 12, 2017 at 4:24pm

ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिए मुबारकबाद क़ुबूल कीजिए 

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on November 12, 2017 at 12:18pm
हम सब 'डर-डर भोगी' ही तो यह गये हैं। सच्चाई और पते की बात कहती बेहतरीन सार्थक ग़ज़ल के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत मुबारकबाद मुहतरम जनाब सलीम रज़ा रीवा साहिब।
Comment by Mohammed Arif on November 12, 2017 at 7:47am
किसी ग़रीब कि हमको न आह लग जाए.
इसीलिए तो हर- इक बद्दुआ से डरते हैं । बहुत ख़ूब! बहुत उम्दा शेर
शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल कीजिए आदरणीय सलीम रज़ा साहब ।
Comment by Afroz 'sahr' on November 12, 2017 at 7:10am
जनाब सलीम रज़ा साहिब बहुत मुबारकबाद पेश करता हूँ। ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिए। मतले में "ईता" दोष है देखिएगा,,सादर,,,,,
Comment by प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप' on November 11, 2017 at 11:54pm
ज़नाब़ नादिर साहिब!

शुक्रगुज़ार हूँ, आपकी बात मेरे ज़ेहन तक पहुँची है।
Comment by नादिर ख़ान on November 11, 2017 at 11:51pm

टाइप करते वक्त गलती हो गई होगी शायद ......"जिन्हे है ख़ौफ़-ए-ख़ुदा वो सज़ा से डरते हैं "   ऐसा लिखना चाह रहे होंगे ...टाइपिंग मिस्टेक हो जाती है ...बाकि जनाब सलीम भाई बेहतर बता सकते है । आदरणीय प्रदीप भाई सही पकड़े हैं .......

Comment by प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप' on November 11, 2017 at 11:00pm
ज़नाब सलीम रज़ा साहिब !


सबसे पहले तो आपको एक बेहतरीन ग़ज़ल के लिए दिली मुबारकबाद देना चाहूँगा।

उसके बाद कुछ सीखने के मक़सद से एक सवाल दिल में है, आप सभी से पूछ रहा हूँ,

इस ग़ज़ल के मतले में काफिया इब्तदा और ख़ुदा बाँधा गया है। क्या यह काफिया ठीक हैं। इसके अलावा आगे क अश्आर में काफिया बदलता नज़र आ रहा है। ज़रा कोई मेरी इस शंका को दूर करने की मेहरबानी अता करे। शुक्रगुजार रहूंगा।

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