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बहर - 2122 2122 2122 212

जिंदगी में फिर मुझे बचपन मेरा हँसता मिला ......
जब हुआ बटवारा तो माँ का मुझे कमरा मिला ........

आज़माये थे बहुत पर शख्स हर झूठा मिला ,
तेरे रूप में यार मुझको एक आईना मिला .......

राह में मैंने लिखा देखा था जिस पत्थर पे माँ ......
लौट कर आया तो इक बच्चा वहाँ सोता मिला ......


बुझ गये थे दीप सारे प्यार के उस बस्ती में
दर्द का इक दीप मुझको फिर वहाँ जलता मिला .......


जी रही थी वो फ़क़त सच्ची मुहब्बत के लिए ,
पर उसे जो भी मिला वो ज़िस्म का प्यासा मिला ........


यूँ तो वो मेरी ग़ज़ल पर " वाह " करता था नहीं
पर वो तन्हाई में फिर मेरी ग़ज़ल कहता मिला .......

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Comment by Gajendra shrotriya on Thursday

 बहुुुत उम्दा खयाल  बुने हेै आ० पंकजोम जी । बहुुुत बधाई आपकाो  इस ग़ज़ल के 

लिए।

Comment by Ajay Tiwari on December 7, 2017 at 2:00pm

आदरणीय पंकज जी,

ख़ूबसूरत ग़ज़ल हुई है. हार्दिक बधाईयाँ.

'यूँ तो वो मेरी ग़ज़ल पर " वाह " करता था नहीं' की जगह  'यूँ कभी मेरी ग़ज़ल पर दाद उसने दी न थी' भी एक संभावित मिसरा हो सकता है.

सादर 

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on December 4, 2017 at 9:32pm

बहुत ही विचारोत्तेजक ग़ज़ल सृजन के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत मुबारकबाद मुहतरम जनाब पंकजोम ' प्रेम' साहिब।

Comment by पंकजोम " प्रेम " on December 4, 2017 at 3:44pm

बेहद शुक्रगुज़ार हूँ आपके आशिर्वाद का आ0 afroz shar जी ....

Comment by पंकजोम " प्रेम " on December 4, 2017 at 3:43pm

बेहद शुक्रगुज़ार हूँ आपके आशिर्वाद का आ0 दादा मनोज जी .... आ0 दादा dr पवन जी ....

Comment by पंकजोम " प्रेम " on December 4, 2017 at 3:24pm
बेहद शुक्रगुज़ार हूँ आपके आशिर्वाद का आ0 दादा samar kabber जी ..... आ0 भाई सुरेन्द्र जी ....
Comment by पंकजोम " प्रेम " on December 4, 2017 at 3:23pm
बेहद शुक्रगुज़ार हूँ , आपके आशिर्वाद का आदरणीय दादा mohammad arif जी ...
Comment by Samar kabeer on December 4, 2017 at 3:15pm
जनाब पंक्जोम'प्रेम' साहिब आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।
कुछ बातें आपके संज्ञान में लाना चाहूँगा :-

मतले का ऊला मिसरा अगर यूँ कर लें तो मफ़हूम बिल्कुल साफ़ हो जाएगा :-
'ज़िन्दगी में फिर वहाँ बचपन मेरा हँसता मिला'

'आज़माए थे बहुत पर शख़्स हर झूठा मिला
तेरे रूप में यार मुझको एक आईना मिला'
इस मतले के ऊला मिसरे में शिल्प कमज़ोर है, और सानी मिसरा लय में नहीं है,इस मतले को यूँ किया जा सकता है:-
'आज़माया जब कभी,हर आदमी झूठा मिला
रूप में ऐ दोस्त तेरे मुझको आइना मिला'

'बुझ गए थे दीप सारे प्यार के उस बस्ती में'
इस मिसरे को यूँ कर लें तो गेयता बहतर हो जाएगी :-
'बुझ गए थे दीप उस बस्ती में सारे प्यार के'

'यूँ तो वो मेरी ग़ज़ल पर वाह करता था नहीं
पर वो तन्हाई में फिर मेरी ग़ज़ल कहता मिला'
इस शैर में शिल्प कमज़ोर है, इसे यूँ कर सकते हैं :-
'यूँ तो वो मेरी ग़ज़ल पर वाह करता ही न था
पर वो तन्हाई में फिर मेरी ग़ज़ल पढ़ता मिला'

बाक़ी शुभ शुभ ।
Comment by Afroz 'sahr' on December 4, 2017 at 2:16pm
आदरणीय पंकजोम जी इस रचना पर बधाई आपको,
हुस्न ए मतला का सानी मिसरा बह्र में नहीं है।
कई मिसरों में शिल्प कमज़ोर है, ग़ज़ल को थोड़ा और वक़्त दीजिएगा सादर,,,
Comment by Mohammed Arif on December 3, 2017 at 5:34pm
आदरणीय पंकजोम जी आदाब,
अच्छे ख़्यालातों से गूँथी बेहतरीन ग़ज़ल । हर शे'र उम्दा । दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल कीजिए । बाक़ी गुणीजन अपनी राय देंगे ।

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