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2122 2122 212
फिर कोई सिक्का उछाला जा रहा ।
रोज मुझको आजमाया जा रहा ।।

मानिये सच बात मेरी आप भी ।
देश को बुद्धू बनाया जा रहा ।।

कौन कहता है यहां सब ठीक है ।
हर गधा सर पे बिठाया जा रहा ।।


हो रहे मतरूफ़ सारे हक यहां ।
राज अंग्रेजों का लाया जा रहा ।।

हर जगह रिश्वत है जिंदा आज भी ।
खूब बन्दर को नचाया जा रहा ।।

कुछ हिफाज़त कर सकें तो कीजिये ।
बेसबब ही जुर्म ढाया जा रहा ।।

इंतकामी हौसलों के साथ अब ।
मुल्क को नस्तर चुभाया जा रहा ।।

लूट का जिन पर लगा इल्जाम था ।
फिर इलक्शन में जिताया जा रहा ।।

कल तलक नजरों में था वो इक खुदा ।
आज नजरों से उतारा जा रहा ।।

क्या लियाकत आदमी की है यहां ।
आइना खुलकर दिखाया जा रहा ।।

- नवीन मणि त्रिपाठी

मौलिक अप्रकाशित 

Views: 517

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Comment by नाथ सोनांचली on December 11, 2017 at 5:06am

आद0 नवीन जी सादर अभिवादन। बेहतरीन ग़ज़ल कही आपने, शैर दर शैर मुबारकबाद कुबूल करें। सादर

Comment by रक्षिता सिंह on December 8, 2017 at 1:34am

आदरणीय , नवीन जी

आधुनिक युग की वास्तविकता को आपने बहुत ही सुन्दर पंक्तियों में पिरोया..बधाई स्वीकार करें।

Comment by Naveen Mani Tripathi on December 8, 2017 at 12:12am

आ0 कबीर सर सादर प्रणाम  । अवश्य ठीक करता हूँ ।

Comment by Samar kabeer on December 7, 2017 at 10:09pm

जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

छटे शैर के सानी मिसरे में 'जुर्म' की जगह "ज़ुल्म" कर लें ।

सातवें शैर के सानी मिसरे में ऐब-ए-तनाफ़ुर है,'मुल्क को',इसे "देश को" कर सकते हैं,इसी मिसरे में 'नस्तर'  को "निश्तर" कर लें ।

'लूट का जिन पर लगा इल्ज़ाम था'

सानी मिसरे की मुनासिबत से इस मिसरे को इस तरह करना मुनासिब होगा:-

'लूट का इल्ज़ाम था जिन पर उन्हें'

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