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कार्यकर्त्ता:मंत्रीजी से मिलना है।
पीए:नहीं मिल सकते।
कार्यकर्त्ता:क्यूँ?
पीए:माननीय अभी (......से ) बेगुनाही का प्रमाण पत्र खरीदने गये हैं।
का.:क्या?
पीए:अरे विरिधियों ने घोटाले में फँसा दिया है न।
का.:अच्छा्! तो डिग्री का मामला है।
"मौलिक      व  अप्रकाशित"

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Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on December 27, 2017 at 9:55pm

हार्दिक बधाई इस लघुकथा के लिए आदरणीय|

Comment by Mahendra Kumar on December 27, 2017 at 10:20am

अच्छी व्यंग्यात्मक लघुकथा है आ. मनन जी. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. "विरिधियों" को "विरोधियों" कर लीजिएगा. सादर.

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 26, 2017 at 4:36pm

बेहतरीन कथा, हार्दिक बधाई ।

Comment by Manan Kumar singh on December 26, 2017 at 2:02pm

आदरणीय समर जी,आदाब!आपका बहुत बहुत शुक्रिया।

Comment by Samar kabeer on December 26, 2017 at 2:00pm

जनाब मनन कुमार सिंह जी आदाब,बहुत ख़ूब वाह, आजकल आपकी लघुकथाएं कमाल कर रही हैं,क्या शानदार तंज़ है भाई,मज़ा आ गया,इस बहतरीन प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by नाथ सोनांचली on December 26, 2017 at 9:44am

आद0मनन कुमार जी सादर अभिवादन। बेहतरीन कटाक्ष किया आपने। सुंदर प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार कीजिये। सादर

Comment by Manan Kumar singh on December 25, 2017 at 10:50pm

आभारी हूँ आदरणीय आरिफ भाई।

Comment by Mohammed Arif on December 25, 2017 at 10:12pm

आदरणीय मनन कुमार जी आदाब,

                               बहुत ही कटाक्षपूर्ण लघुकथा के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

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