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-बस जरा बर्त्तन पटक देती हूँ,वे समझ जाते हैं।
-कि तू गुस्से में है?
-और क्या?
-तू भी न।
-तू भी क्या री?रातभर जगाते हैं।बर्त्तन मेरे,सुबह मेरी।
-पर मेरा काम तो इस तरह पटकने-झटकने से नहीं चलता है न।
-क्यूँ?
-वो सुन नहीं सकते री।
-तो फिर?
-क्या करूँ,मुझे तो बेलन ही भाँजना पड़ता है।
-धत्त तेरी!
 "मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by Manan Kumar singh on December 28, 2017 at 7:50pm

आदरणीया राहिलाजी,आपका आभार

Comment by Manan Kumar singh on December 28, 2017 at 7:49pm

आदरणीय तेजवीर जी,आपका आभार

Comment by Manan Kumar singh on December 28, 2017 at 7:48pm

आदरणीय तेजवीर जी,आपका आभा

Comment by Mahendra Kumar on December 28, 2017 at 3:02pm

अच्छी लघुकथा है आ. मनन जी. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. सादर.

Comment by Rahila on December 28, 2017 at 2:58pm

बहुत बढ़िया रचना।वैसे ज्यादातर कान वाले भी ना सुन पाने की बीमारी से ग्रस्त होते है।उनके लिए बहुत उम्दा इलाज।हा हा हा... सादर

Comment by TEJ VEER SINGH on December 28, 2017 at 1:21pm

हार्दिक बधाई आदरणीय मनन कुमार जी।बेहतरीन लघुकथा।

Comment by Manan Kumar singh on December 27, 2017 at 10:15pm

आभार आदरणीया कल्पना जी।

Comment by Manan Kumar singh on December 27, 2017 at 10:14pm
आभरा आदरणीया कल्पना जी।
Comment by Samar kabeer on December 27, 2017 at 10:12pm

जनाब मनन कुमार सिंह जी आदाब,लघुकथा अच्छी है,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on December 27, 2017 at 9:54pm

बढ़िया कटाक्ष हुआ है आदरणीय| हार्दिक बधाई|

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