For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

पहाड़ी नारी  (लम्बी कविता 'राज')

पहाड़ी नारी  

कुदरत के रंगमंच का    

बेहद खूबसूरत कर्मठ किरदार   

माथे पर टीका नाक में बड़ी सी नथनी

गले में गुलबन्द ,हाथों में पंहुची,

पाँव में भारी भरकम पायल पहने

कब मेरे अंतर के कैनवास पर

 चला आया पता ही नहीं चला

 पर आगे बढने से पहले ठिठक गई मेरी तूलिका 

 हतप्रभ रह गई देखकर

एक  ग्रीवा पर इतने चेहरे!!!

कैसे संभाल रक्खे हैं  

हर चेहरा एक जिम्मेदारी के रंग से सराबोर

कोई पहाड़ बचाने का

कोई जंगल बचाने का

कोई पलायनवाद रोकने का

कोई नदी बचाने का

कोई अपना अस्तित्व बचाने का

किस अद्दभुत मिट्टी से बना हुआ है ये जिस्म

इस पहाड़ी नारी का?

कहाँ है इसका आसमान? उसपर कैसे चिपकाऊँ  सूरज   

इसका सूरज तो खेतों में उगता है

गदेरों से खींचे गए पानी की बाल्टियों, मटकियों में उगता है

सर पर रक्खे हुए घास के डेर में उगता है

इसकी आँखों में करुणा और संघर्ष का काजल दूर तक भासमान है

जो  चमकता नहीं दहकता है

मेरे कैनवास के दूसरे किरदार

जब  हड्डियों को कंपकंपाने वाली सर्दी में

रिजाई में दुबके होते हैं

तब ये माथे पर पसीना ओढ़े

भीगे बदन से चिपके वस्त्रों से उड़ती हुई भाप लिए

नुकीले पथरीले पहाड़ों से मीलों की दूरी तय करते हुए

सर पर औकात से ज्यादा बोझा लिए हुए

घर की दहलीज पर पाँव रखती होती है

तब तक इसका सूरज

इसकी हथेलियों और पाँव के छालों में पिघल चुका होता है

ये एक ऐसी पहाड़ी नदी है जिस पर कोई पुल नहीं

जिसमे कोई किश्ती या शिकारा नहीं चलता

बस पत्थरों के नुकीले जबड़ों से चिन्दा चिंदा बदन

लिए चुपचाप अनवरत बहती रहती है

न जाने कितने उदर चिपके हैं इस एक जिस्म में

जिनकी भूख शांत करते-करते

इसकी देह इसकी जिन्दगी भी पहाड़ सी हो गई है  

 चाँदनी रात में जहाँ दूसरे  किरदार

क्लबों में पार्टियों में जश्न मनाते हैं

बदन थिरकाते हैं   

 ये चूल्हे में उठते हुए गीली लकड़ियों

के धुएँ को  धौंकनी से अपने फेफड़ों में भरती हैं  

हथेलियों  पर  रोटी  की थपथप  

आंचल में स्तनपान की चपचप

सामने बैठे कई भूखे उदर की थालियों कटोरियों की खट-पट   

वहीँ थोड़ी दूरी पर चारपाई से दारु के सुरूर में चूर

 जिस्मानी भूख लिए हुए बेसब्री से घूरती हुई एक जोड़ी आँखें 

 फिर भी इसके चेहरे पर न कोई थकन न कोई शिकन

कहाँ से भरा ये रंग हे नारी?

सहन शीलता की पराकाष्ठा को छूते छूते

आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता,आत्मसम्मान

 सशक्तिकरण के कुछ और अच्छे नये रंग

ढूँढने निकल चुकी है आज ये घर से बाहर

नित नई चुनौतियों  का सामना करती हुई   

नये नये सौपान चढ़ती हुई  

बढ़ रही है उस गगन की  ओर

जहाँ खुद अपने हाथों से

अपने हिस्से के सूरज को अपने आसमान पर  दैदीप्यमान करेगी  

जिसे देख कर सारी दुनिया कहेगी  

वो देखो पहाड़ की नारी, एक सशक्त  नारी

और उस दिन होगा मेरा ये  किरदार सम्पूर्ण... |

 

(इस कविता ने उत्तराखंड महिला एसोसीएशन द्वारा आयोजित काव्य प्रतियोगिता में द्वित्य स्थान प्राप्त किया  तथा आकाशवाणी देहरादून से प्रसारित भी हुई )

Views: 1969

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 10, 2018 at 6:47am

बदन थिरकाते हैं   

 ये चूल्हे में उठते हुए गीली लकड़ियों

के धुएँ को  धौंकनी से अपने फेफड़ों में भरती हैं  

हथेलियों  पर  रोटी  की थपथप  

आंचल में स्तनपान की चपचप

सामने बैठे कई भूखे उदर की थालियों कटोरियों की खट-पट   

बहुत सुंदर चित्र प्रस्तुत हुआ है । बेहतरीन कबिता और पुरस्कार प्राप्ति के लिए हार्दिक बधाई , आ. राजेश दी ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 9, 2018 at 9:18pm

आद० कालिपद प्रसाद जी , कविता की  गहराई तक पंहुच कर दी गई आपकी प्रतिक्रिया हेतु दिल से शुक्रगुज़ार हूँ .बहुत बहुत आभार सादर .

Comment by Kalipad Prasad Mandal on January 9, 2018 at 9:48am

आदरणीय राजेश कुमारी जी , कविता को द्वितीय पुरस्कार मिला एवं आकाश वाणी देहरादून से प्रसारित हु,आ है  ,इ सके लिए मुबारकबाद

कुबूल करें |  पहाड़ी नारी का  शाब्दिक चित्र इनती अच्छी तरह वही खिंच सकता है जिसने करीब से देखा है | प्रतिदिन  के दिनचर्या से लेकर नारी उत्थान को जोड़कर कविता को बहुत उच्च स्तर  पर ला दिया है आपने | हार्दिक बधाई आपको 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 7, 2018 at 5:48pm

आद० समर भाई जी ,कविता को अपने पूरा वक़्त दिया दुबारा शिरकत की ध्यान से उसे पढकर अपने विचार रखे इसका दिल से बेहद शुक्रिया |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 7, 2018 at 5:47pm

आद० अजय तिवारी जी ,कविता पर अपने विचार रखने और इस्स्लाह देने का दिल से शुक्रिया 

Comment by Samar kabeer on January 6, 2018 at 11:14pm

बहना राजेश कुमारी जी,आपकी इस कविता को मुक़ाबले में दूसरा स्थान मिला,और इसका प्रसारण आकाशवाणी से भी किया गया,इसके लिए आपको दिल से बधाई देता हूँ ।

इस कविता को बहुत ध्यान से पढ़ा,और जनाब सौरभ पाण्डेय साहिब की टिप्पणी को भी बार-बार पढ़ा,और उनकी टिप्पणी पर आपका जवाब भी,और मैं इस नतीजे पर पहुँचा हूँ कि इससे ज़ियादा सटीक टिप्पणी इस कविता पर नहीं की जा सकती,जनाब सौरभ भाई ने जहाँ तारीफ़ करना थी वहाँ पूरी ईमानदारी से तारीफ़ की है, और जहाँ जहाँ उन्होंने क़लम लगाया है,उसका कोई जवाब नहीं,मैं उनसे पूरी तरह सहमत हूँ, अपनी तरफ़ से इतना कहूँगा कि आज के युग में कविता अपनी तवालत की वजह से अपना असर खो देती है,इस कविता से भी ग़ैर ज़रूरी लाइनें हटाई जा सकती थीं,लेकिन ये प्रतियोगिता को जीतने की वजह से करना पड़ा,मेरे ख़याल में अगर आप अपने मख़सूस अंदाज़ में ये कविता लिखतीं तो ये प्रथम स्थान पा सकती थी ।

Comment by Ajay Tiwari on January 6, 2018 at 4:47pm

आदरणीया राजेश जी,  इस संवेदनशील मानवीय काव्य-प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई.

शिल्प पर थोड़ा और ध्यान देने की जरूरत थी जिसकी तरफ आदरणीय सौरभ जी संकेत कर चुके हैं. वस्तुतः छंद मुक्त कविता ज्यादा कठिन कव्यानुशासन की मांग करती है. छंद मुक्त कविता लिखते हुए छंद की मजबूरियों का बहाना नहीं होता और कवि के लिए अपना सर्वोतम प्रस्तुत करना एक अनिवार्य जिम्मेदारी बन जाती है वर्ना कविता के गद्य के पाले में लुढकने का खतरा हमेशा बना रहता है. 

सादर      


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 6, 2018 at 1:03pm

आद० समर भाई जी ,आपकी पूर्ण प्रतिक्रिया का इन्तजार रहेगा इस कविता पर .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 6, 2018 at 1:02pm

प्रिय प्रतिभा जी ,आपको कविता पसंद आई दिल से बेहद शुक्रगुजार हूँ कुमाऊंनी गीत कि पंक्तियाँ बहुत अच्छी हैं सच में पहाड़ों की नारियों की स्थिति ऐसी ही है पुरुष वर्ग मस्ती में रहता है स्त्रियाँ घर चलाती हैं .किन्तु अव स्त्रियों में जागरूकता आ रही है धीरे धीरे . 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 6, 2018 at 12:58pm

आद० सौरभ जी कविता पर आपकी उपस्थिति और समीक्षा दोनों के लिए मैं दिल से शुक्रगुजार हूँ ,कविता कि रूह को छूकर निकली आपकी ये समीक्षा स्वागतीय है | आपके दिल से बहुत बहुत शुक्रिया .  मेरा लिखना सार्थक हो गया |कविता के जिन अंतिम पंक्तियों कि तरफ आपका इशारा है  उसके पीछे का कारण भी मैं आपको स्पष्ट कर रही हूँ दरअसल ये कविता एक प्रतियोगिता के तहत लिखी गई थी जिसमे पहाड्की नारी की पूर्व स्थति और आज के महिला सशक्तिकरण के युग  से बदले हालात को मद्देनजर रखते हुए लिखनी थी अर्थात आज उनकी स्थिति में क्या बदलाव आ रहा है इसलिए ये सकारात्मता लानी भी अवश्य थी ताकि ये पहलू अछूता न रह जाए इसलिए ये पंक्तियाँ जोडनी पड़ी. और इसी सकारात्मक सन्देश और अंत के कारण ये दूसरों कि कविताओं पर  भारी पड़ी  जिसका बाद में चयनकर्ताओं ने भी जिक्र किया .वरना मेरी कविताओं का स्वरुप इससे भिन्न होता है ये तो आप जानते हैं | 

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Profile IconShyamsundar Chatterjee , Alamseti ajita kumar and Dr. Mohd Israr joined Open Books Online
2 hours ago
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत रचना की सारगर्भित समीक्षा कर आपने मेरे सृजन कार्य को सार्थकता…"
Saturday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"परम आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम - सर सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार…"
Friday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"वायव्य दशा के प्रस्तुतीकरण के क्रम में बना विश्वास प्रस्तुति की शाब्दिकता को स्थापित करता हुआ सफल…"
Friday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"संसार का मंच एक गंभीर विषय है. तदनुरूप आपका प्रयास श्लाघनीय है, आदरणीय सुशील सरना जी.  कई…"
Friday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय अशोक भाईजी, कितनी निष्कपट, कितनी भोली, कितनी सरस कविता हुई है ! जैसे, कोई अबोध बच्चा…"
Friday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"आदरणीय  अशोक रक्ताले जी सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार आदरणीय…"
Thursday
Ashok Kumar Raktale commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"चुप रहिए...  वाह  क्या रदीफ़ है, इसे देखकर ही मैं हाज़िर हो गया.  रहना हो भारत में…"
Jul 5
Ashok Kumar Raktale commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"अभिनय करते मंच पर, माटी के किरदार ।जीवन की अनुभूतियाँ, करते वो साकार ।।.....सच है अभिनय जीवन की…"
Jul 5
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

बरसात

बरसात घन गरजे अंधियारी छाई,बिजली अम्बर पर इठलाई  बूँदें टपकी टप-टप भाईरिमझिम रिमझिम बारिश आई पत्ते…See More
Jul 5
vijay nikore replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"Dear respected Admin team: A few minutes ago, I typed my suggestion, but lost it all before it was…"
Jul 5
vijay nikore replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"..."
Jul 5

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service