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खुली खिचड़ी(लघु कथा)


मामले की सुनवाई के उपरांत सजा तय हो चुकी थी।अब ऐलान होना शेष था।न्याय-प्रक्रिया के चौंकानेवाले तेवर के मद्दे नजर लोगों में उत्सुकता बढ़ती जा रही थी कि घोटाले के इस मामले में आखिर क्या सजा होती है।बाकी के हश्र सामने थे,वही ढाक के तीन पात जैसे।और न्याय की देवी आज -कल में फँसी हुई थी,क्योंकि कभी किसी वकील की मर्सिया-सभा हो रही होती, तो कभी कुछ और कारण होता।
-फिर कल?
-‎हाँ, अब कल सजा सुनाई जायेगी।
-‎वो क्यों?
-‎पता नहीं।हाँ मुजरिम ने कुछ कम सजा की गुहार लगायी है।
-‎मतलब कि यहाँ भी आरक्षण?
-‎अरे नहीं रे चंदू,बात कुछ और लगती है',भोला बोला।
-‎हाहाहा!पब्लिक सब जानती है।लगता है खिचड़ी तवे पर पक रही है ........च्च... ओर... सब...स्सा..',चंदू नजर नचाते हुए कहता चला गया।
-‎..और महक हवा में तैर रही है,हेहेहे---',भोला ने चुटकी ली।

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by Mohammed Arif on January 6, 2018 at 2:01pm

आदरणीय मनन कुमार जी आदाब,

                सामयिकता का पुट लिए बेहतरीन लघुकथा के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

                       

Comment by Samar kabeer on January 6, 2018 at 11:36am

जनाब मनन कुमार सिंह जी आदाब,अच्छी लघुकथा है, बधाई स्वीकार करें ।

पहली पंक्ति में 'मामले' को "मुआमले" कर लें ।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on January 6, 2018 at 8:24am

वाह। समसामयिक घटनाचक्र पर पैनी लेखनी के लिए हार्दिक बधाई आदरणीय मनन कुमार सिंह जी। पात्रों के नामों की विशेष ज़रूरत नहीं थी। चोर-चोर मौसेरे भाई। चोर के पीछे चोर। पर चोर मचायें शोर। जनता हो गई बोर। घोर अंधेर। सबकी सबसे बैर... भ्रष्टाचारियों की सैर!

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