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ग़ज़ल - मुकम्मल भला कौन है इस जहां में

बह्र- फऊलुन फऊलुन फऊलुन फऊलुन

ग़ज़ब की है शोखी और अठखेलियाँ हैं।
समन्दर की लहरों में क्या मस्तियाँ हैं।

महल से भी बढ़कर हैं घर अपने अच्छे,
भले घास की फूस की आशियाँ हैं।

मुकम्मल भला कौन है इस जहाँ में,
सभी में यहाँ कुछ न कुछ खामियाँ हैं।

ज़िहादी नहीं हैं ये आतंकवादी,
जिन्होंने उजाड़ी कई बस्तियाँ हैं।

ये नफरत अदावत ये खुरपेंच झगड़े,
सियासत में इन सबकी जड़ कुर्सियाँ हैं।

समन्दर के जुल्मों सितम से हैं टूटी,
किनारे पड़ी जो कई कश्तियाँ हैं।

ये कैसी तरक्की दिवाली के दिन भी,
अँधेरे में डूबी हुई झुग्गियाँ हैं।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Ram Awadh VIshwakarma on January 10, 2018 at 6:42pm

आदर्णीय लक्ष्मण धामी मुसाफिर जी ग़ज़ल सराहना के लिये सादर धन्यवाद।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 10, 2018 at 6:58am

आ. भाई रामअवध जी, हार्दिक बधाई। 

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on January 9, 2018 at 6:39am

आदर्णीय बृजेश कुमार ब्रज जी सादर आभार

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on January 9, 2018 at 12:39am

बहुत ही सुन्दर ख्याल है आदरणीय..सादर

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on January 8, 2018 at 8:44pm

आदर्णीय सुरेन्द्र नाथ सिंह जी ग़ज़ल आपको पसन्द आई इसके लिये सादर धन्यवाद

Comment by नाथ सोनांचली on January 8, 2018 at 1:29pm

आद0 राभ अवध जी अच्छी ग़ज़ल कही आपने,बहुत बहुत बधाई।

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on January 8, 2018 at 5:58am

आदर्णीय समर कबीर सर जी आपका बहुत बहुत आभार

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on January 8, 2018 at 5:54am

आदर णीय मोहित मिश्रा जी बहुत बहुत शुक्रिया

Comment by Samar kabeer on January 6, 2018 at 10:33pm

जनाब राम अवध जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,त्रुटियों के बारे में गुणीजन बता चुके,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Afroz 'sahr' on January 6, 2018 at 7:18pm
जनाब राम अवध जी रदीफ़ की और प्रतिक्रिया देने के बाद ध्यान गया।
शेर को यूँ कहा जा सकता है।
"हैं महलों से बढ़कर के ये ख़ूबसूरत"
"नज़र में तुम्हारी फ़कत झुग्गियाँ हैं"

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