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शीत के दोहे - लक्ष्मण धामी ' मुसाफिर'

शीत के दोहे


बालापन सा हो गया, चहुँदिश तपन अतीत
यौवन सा ठिठुरन लिए, लो आ पहुँची शीत।१।


मौसम बैरी  हो  गया, धुंध ढके हर रूप
कैसै देखे अब भला, नित्य धरा को धूप।२।


शीत लहर के तीर नित, जाड़ा छोड़े खूब
नभ  के  उर  में  पीर  है, आँसू  रोती दूब।३।


हाड़  कँपाती  ठंड  से , सबका  ऐसा हाल
तनमन मागे हर समय, कम्बल स्वेटर शॉल।४।


शीत लहर फैला रही, जाने क्या क्या बात
दिन घूँघट  में  फिर रहा, थरथर काँपे रात।५।


लगी लालसा धूप की, नहीं सुहाती छाँव
तापे खूब अलाव अब, भीतर बाहर गाँव।६।


झूमे  ओढ़  तुसार  को, गेहूँ  सरसों  खेत
प्यास बुझाती ओस से, देखो बिखरी रेत।७।


सारी  धरती  लग रही, ज्यों  कुहरे  की झील
उस पर सूरज भी हुआ, घट कर अब कंदील।८।


जमा नदी का नीर है, हिम शिखरों की गोद
जहाँ  लोग  हिमपात  में, करते  हैं  आमोद।९।


हिम  से  देखो  ढक  गये, घाटी  और  पहाड़
कामकाज सब ठप हुआ, दुनियाँ झोंके भाड़।१०।

मौलिक अप्रकाशित

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 10, 2018 at 6:38am

आ. भाई बृजेश जी, स्नेह के लिए आभार।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 10, 2018 at 6:37am

आ.भाई समर जी, सादर अभिवादन। दोहों पर आपकी उपस्थिति और प्रतिक्रिया से लेखन सफल हुआ । मार्गदर्शन करते रहिए ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on January 9, 2018 at 9:39pm

बहुत ही सुन्दर दोहे रचे हैं आदरणीय..सादर

Comment by Samar kabeer on January 9, 2018 at 2:44pm

जनाब लक्ष्मण धामी जी आदाब,बढ़िया दोहे लिखे आपने,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 8, 2018 at 10:48pm

आ. भाई सलीम जी, स्नेहपूर्ण प्रशंसा के लिए आभार।

Comment by SALIM RAZA REWA on January 8, 2018 at 5:48pm
भाई लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी,
आपके दोहों ने दिल को छू लिए बहुत बहुत बधाई.
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 8, 2018 at 3:49pm

आ. भाई सुरेंद्र जी सादर अभिवादन । आपको दोहे अच्छे लगे , आभार । यहाँ भाड़ झोंकने का तात्पर्य खाली बैठने से लें ।

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on January 8, 2018 at 1:52pm

दुनिया झोंके भाड़??? यह थोड़ा अटपटा लगा

आद0 लक्ष्मण धामी जी सादर अभिवादन। बेहतरीन दोहावली रचे आप। बहुत बढ़िया।इस प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई स्वीकार करें। सादर

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