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माँ के हाथों से जब खाया जाता है (ग़ज़ल)

अरकान-फेलुन फेलुन फेलुन फेलुन फेलुन फ़ा

ऐसे रिश्ता यार निभाया जाता है
वक़्त पड़े तो ग़म भी खाया जाता है ।।

भूख लगी हो और न हो कुछ खाने को
बच्चे का फिर दिल बहलाया जाता है।।

लाख छुपाने से भी जब ये छुप न सके
फिर क्यों यारो इश्क़ छुपाया जाता है।।

तब होती है घर में बरकत ही बरकत
मुफ़लिस को महमान बनाया जाता है ।।

रुखा सूखा खाना लज़्ज़त दार लगे
माँ के हाथों से जब खाया जाता है ।।

चुंगल में सेठों के जो इक बार फँसे
सदियों तक फिर कर्ज चुकाया जाता है ।।

फूलों की ख़ुशबू का कोई जुर्म नहीं
भवरों पर इल्ज़ाम लगाया जाता है ।।

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by surender insan on January 12, 2018 at 2:49pm

वाह वाह बहुत बढ़िया ग़ज़ल हुई है बधाई स्वीकार करे भाई सुरेन्द्र जी।

Comment by Kalipad Prasad Mandal on January 12, 2018 at 9:45am

आ सुरेन्द्र नाथ सिंह जी बहुत सुन्दर ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 11, 2018 at 12:02pm

आ. भाई सुरेंद्र जी, सुंदर गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on January 10, 2018 at 10:05pm

वाह आदरणीय क्या शानदार ग़ज़ल कही..सादर

Comment by Samar kabeer on January 9, 2018 at 11:12pm

जनाब सुरेन्द्र नाथ सिंह जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबफ पेश करता हूँ ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 9, 2018 at 9:27pm

वाह्ह्ह बहुत अच्छी ग़ज़ल कही है भैया शेर दर शेर दाद स्वीकारें 

होती है घर में बरकत ही बरकत जब 

मुफ़लिस को महमान बनाया जाता है ।।--ऐसा करने से मफ्हूम ज्यादा साफ़ होगा 

Comment by नाथ सोनांचली on January 9, 2018 at 11:06am

आद0 मोहित मुक्त जी सादर अभिवादन। ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिति और हौसला अफजाई का बहुत बहुत आभार।

Comment by नाथ सोनांचली on January 9, 2018 at 11:05am

आद0 श्याम नारायण वर्मा जी सादर धन्यवाद

Comment by नाथ सोनांचली on January 9, 2018 at 11:04am

आद0 सुशील सरना जी सादर अभिवादन। ग़ज़ल पर उपस्थिति और हौसला अफजाई का बहुत बहुत शुक्रिया। सादर

Comment by Shyam Narain Verma on January 8, 2018 at 9:46pm
बहूत उम्दा हार्दिक बधाई

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