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जाने सूरज कब निकले है वक्त अभी रुसवाई का------गज़ल

22 22 22 22 22 22 22 2

नैन में रैन गँवाए जाऊँ, वक्त पहाड़ जुदाई का

जाने सूरज कब निकले, है वक्त अभी रुसवाई का

उनको कोई ग़रज़ नहीं जो पूछें हाल हमारा भी

कोई दूजी वज्ह नहीं, परिणाम है कान भराई का

हमनें चाँद के दाग पे केवल शेर पढ़ा इक, महफ़िल में

चहरे का रँग बोल रहा था हाल खुदी हरजाई का

खुद की ख़ता भी खुद को सज़ा भी, रोना धोना कैसा फिर

देवी उसको बना दिया, फिर मुद्दा कहाँ रसाई का

यारों चिंता कोई न करिए, रोज़ मिलूँगा राहों में

याद में जलना, शेर में ढ़लना, काम है इस सौदाई का

मौलिक अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Ajay Tiwari on January 13, 2018 at 5:54pm

आदरणीय पंकज जी, अच्छे अशआर हुए हैं, हार्दिक बधाई.

यूं तो इस बह्र में १२१२ या २१२१ की संरचना का प्रयोग अक्सर किया गया है, लेकिन वस्तुतः यह एक अरूजी असावधानी है जो मीर द्वारा हुई और दूसरे शायरों द्वारा उसी का अनुकरण किया गया. इस लिए इससे बचना ही बेहतर होगा.

सादर      

 

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 13, 2018 at 5:49pm

आदरणीय ब्रज जी बहुत शुक्रिया

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 13, 2018 at 5:49pm

आदरणीय सुरेंद्र जी सादर धन्यवाद

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 13, 2018 at 5:48pm

आदरणीय काली प्रसाद जी सादर आभार

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on January 13, 2018 at 1:16pm

बड़ी ही खूब ग़ज़ल कही आदरणीय..सादर

Comment by surender insan on January 12, 2018 at 2:46pm

     आदरणीय पंकज कुमार जी ,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा हुआ है , बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Kalipad Prasad Mandal on January 11, 2018 at 8:35pm

आ पंकज कुमार जी ,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा हुआ है , बधाई स्वीकार करें 

Comment by Samar kabeer on January 11, 2018 at 5:11pm

ठीक है ।

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 11, 2018 at 4:28pm

आदरणीय सुरेंद्र सर मैंने समुचित संशोधन का प्रयास किया है

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 11, 2018 at 4:27pm

आदरणीय बाऊजी सादर प्रणाम मसला की जगह पर भी मैंने परिणाम कर दिया है अभी फिलहाल इतना ही

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