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बुलाऊँ नींद, तेरा आना अब ज़रूरी है-ग़ज़ल

1212 1122 1212 22

तुम्हारे दीद की ख़ाहिश अभी अधूरी है

इसीलिए तो निगाहें खुली ही छोड़ी है

तमाम ख़ाब हैं आँखों में तेरी ही ख़ातिर

बुलाऊँ नींद, तेरा आना अब ज़रूरी है

किसी अज़ीज़ नें आख़िर मुझे सिखाया तो

यूँ रोज़ रोज़ ग़ज़ल लिखना बेवकूफ़ी है

जहाँ के लोगों के दुःख दर्द का गरल अपने

उतारा सीने में तब ही कलम ये पकड़ी है

बताऊँ कैसे उन्हें शायरी जुनून हुई

नसों में दौड़ती पंकज के, ये बीमारी है

मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 16, 2018 at 11:31am

आदरणीय लक्ष्मण सर बहुत बहुत आभार

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 16, 2018 at 7:04am

हार्दिक बधाई ।

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 13, 2018 at 5:47pm

आदरणीय अजय जी आपकी बहुत बहुत शुक्रिया, ऐसी गल्ती मुझसे अक्सर हो रही,  मेरी लापरवाही

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 13, 2018 at 5:46pm
आदरणीय बाऊजी सादर प्रणाम, मत्ले के सानी मिसरे में अभी कुछ अच्छा सूझ नहीं रहा, कपके सहयोग की ज़रूरत है।

ददूसरे शेर की कहन अभी सही करने की कोशिश करता हूँ।
Comment by Samar kabeer on January 13, 2018 at 5:32pm

सत्य वचन ।

Comment by Ajay Tiwari on January 13, 2018 at 5:20pm

आदरणीय पंकज जी, अच्छे अशआर हुए है, हार्दिक बधाई.

'दीद' स्त्रीलिंग है, इस लिए इस के साथ 'तुम्हारी' का प्रयोग बेहतर होगा.

सादर    

Comment by Samar kabeer on January 12, 2018 at 11:19am

अज़ीज़म पंकज कुमार मिश्रा आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

मतले के सानी मिसरे में 'निगाहें' शब्द बहुवचन है और रदीफ़ एक वचन में देखियेग ।

दूसरे शैर में क्या कहना चाहते हैं?भाव स्पष्ट नहीं ।

तीसरे शैर में ये ग़लत मशविरा किसने दे दिया आपको ।

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