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दूर कहीं सुख है मेरा (कविता)

दूर कहीं सुख है मेरा 

हैं यहाँ दुखो का डेरा 

करता हूँ जिससे शिकायत

बस उसने तुरंत मुँह फेरा 

हर तरफ़ है तू-तू, मैं-मैं 

हर जगह बस मेरा-तेरा 

हम एक हैं ,ख्वाब बन गया 

समय ने ही है यह खेल खेला 

कंक्रीट  के मकान बन रहे 

भीड़ का है बस रेला-पेला |

देखकर,सब को मैंने सोचा

चला लिया खूब दुखों का ठेला 

स्वच्छ मन से हँसने लगा मैं 

खिल उठा अंतर-मन मेरा 

अब नहीं दुखों को आने देता 

बन गया है, सुख अब मेरा चेला 

लो देखो ,अब मैं हूँ खड़ा

संग मेरे हैं दोस्तों का मेला| 

तुम भी खुश और मैं भी खुश 

सुख हुआ अब देखो मेरा-तेरा| 

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment by narendrasinh chauhan on January 23, 2018 at 2:30pm
खुब सुन्दर रचना
Comment by vijay nikore on January 18, 2018 at 8:28am

रचना अच्छी लगी... हार्दिक बधाई, आदरणीआ कल्पना जी।

Comment by Samar kabeer on January 15, 2018 at 3:01pm

बहना कल्पना भट्ट "रौनक़" जी आदाब,बहुत सुंदर कविता है, इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

अंतिम पंक्ति के ऊपर वाली पंक्ति में 'खुस' को "ख़ुश" कर लें,एक दो जगह टंकण त्रुटियाँ हैं,देख लें ।

Comment by नाथ सोनांचली on January 15, 2018 at 5:57am

आद0 कल्पना जी सादर अभिवादन, बढ़िया कविता लिखी आपने, बहुत बहुत बधाई इसप्रस्तुति पर

Comment by Mohammed Arif on January 14, 2018 at 10:23am

आदरणीय कल्पना भट्ट जी आदाब,

                       बहुत  ही सुंदर किंतु शिकायत भरी कविता के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें कुछ वर्तनीगत अशुद्धियाँ हैं , देखिएगा

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