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साजन मेरे मुझे बताओ, कैसे दीप जलाऊँ

घर आँगन है सूना मेरा, किस विधि सेज सजाऊँ

इंतिजार में तेरे साजन, लगा एक युग बीता

हाल हमारा वैसा समझो, जैसे विरहन सीता

सूनी सेज चिढ़ाए मुझको, अखियन अश्रु बहाऊँ

घर आँगन है सूना मेरा, किस विधि सेज सजाऊँ

वे सुवासित मिलन की घड़ियाँ, लगता साजन भूले

बौर धरे हैं अमवा महुआ, सरसो भी सब फूले

सौतन सी कोयलिया कूके, किसको यह बतलाऊँ

घर आँगन है सूना मेरा, किस विधि सेज सजाऊँ

तपती धरती सूखी नदियाँ, बदरा बस ललचाये

छाँव मिले ना मेरे दिल को, दुख बढ़ता ही जाए

जेठ दुपहरी बदन जलाये, इसको बुझा न पाऊँ

घर आँगन है सूना मेरा, किस विधि सेज सजाऊँ

सावन की घनघोर घटाएँ, करें रात  अँधियारी

नाचे मोर पपीहा जब जब, आये याद तुम्हारी

चमक उठे चपला जब नभ में, मैं विरहन डर जाऊँ

घर आँगन है सूना मेरा, किस विधि सेज सजाऊँ

पाती भेजूँ कितनी तुमको, गयी कसम से हारी

भूल गए क्यों मुझको तुम हे, मेरे कृष्ण मुरारी

पिया मिलन की आस लिए मैं, गीत विरह के गाउँ

घर आँगन है सूना मेरा, किस विधि सेज सजाऊँ

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by vijay nikore on February 5, 2018 at 2:39pm

अति सुन्दर भाव। बधाई।

Comment by Samar kabeer on February 4, 2018 at 9:05pm

जनाब सुरेन्द्र नाथ सिंह जी आदाब,गीत का प्रयास अच्छा हुआ है,बधाई स्वीकार करें ।

गीत की पहली पंक्ति में सखी से सम्बोधन है और बाद की पंक्तियों में साजन से,इसलिये पहली पंक्ति को यूँ कर सकते हैं :-

'साजन मेरे मुझे बताओ, कैसे दीप जलाऊँ'

5वीं पंक्ति में 'अखियन अश्रु बहाऊँ'की जगह "सोचूँ अश्रु बहाऊँ"करना उचित होगा ।

Comment by नाथ सोनांचली on February 4, 2018 at 10:41am

आद0 तेजवीर जी सादर अभिवादन। रचना पर आपकी उपस्थिति और हौसला अफजाई के लिए हृदय तल से आभार

Comment by नाथ सोनांचली on February 4, 2018 at 10:40am

आद0 रक्षिता जी सादर अभिवादन। रचना आपकी प्रशंसा से अभिभूत हुई। आपका हृदय तल से आभार

Comment by TEJ VEER SINGH on February 4, 2018 at 10:25am

हार्दिक बधाई आदरणीय सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' जी।बेहतरीन विरह गीत।

Comment by रक्षिता सिंह on February 4, 2018 at 7:49am

आदरणीय सुरेन्द्र जी,

भाव विभोर कर देने वाली इस सुन्दर रचना के लिए,  हार्दिक बधाई।

Comment by नाथ सोनांचली on February 3, 2018 at 7:35pm
आद0 सुशील सरना जी सादर अभिवादन। आपको गीत पसन्द आया, लिखना सार्थक हुआ। अतिशय आभार आपका।
Comment by Sushil Sarna on February 3, 2018 at 6:03pm

पाती भेजूँ कितनी तुमको, गयी कसम से हारी

भूल गए क्यों मुझको तुम हे, मेरे कृष्ण मुरारी

पिया मिलन की आस लिए मैं, गीत विरह के गाउँ

घर आँगन है सूना मेरा, किस विधि सेज सजाऊँ

वाह अति सुंदर विरह रस में डूबा गीत। .. हार्दिक बधाई स्वीकारें आदरणीय।

Comment by नाथ सोनांचली on February 3, 2018 at 1:13pm
आद0 तस्दीक अहमद खान साहब सादर अभिवादन। बहुत बहुत आभार आपका उत्साहवर्धन और प्रतिक्रिया के लिए। सादर
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on February 3, 2018 at 12:06pm

जनाब सुरेन्द्र नाथ साहिब ,बहुत ही सुन्दर विरह गीत हुआ है ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमायें।

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