For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

फागुन
अलसाई हुई भोर को
फागुनी दस्तक की
गंध ने महका दिया
मेरे अंदर भी
बीज अंकुरित होने लगे
तुम्हारे अहसासों के
शायद तुम भी
गुनगुना रही होगी
होली का गीत
प्रेम की मादल पर
कुछ पुरानी यादें भी
थाप दे रही होंगी
हृदय के आँगन में
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Views: 598

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Mohammed Arif on February 23, 2018 at 8:38am

रचना पर उपस्थिति और सराहना के लिए बहुत-बहुत आभार आदरणीया रक्षिता सिंह जी । आपकी टिप्पणी से लेखन सार्थक हो गया ।

Comment by रक्षिता सिंह on February 23, 2018 at 8:18am

आदरणीय आरिफ जी, नमस्कार

बहुत ही सुन्दर पंक्तियाँ, हार्दिक बधाई स्वीकार करें।

Comment by Mohammed Arif on February 22, 2018 at 3:59pm

दिली आभार आदरणीय सुरेंद्रनाथ जी । 

Comment by Mohammed Arif on February 22, 2018 at 3:57pm

बहुत-बहुत दिली शुक्रिया आदरणीय तस्दीक़ अहमद जी । लेखन सार्थक हुआ ।

Comment by नाथ सोनांचली on February 22, 2018 at 3:02pm

आद0 मोहम्मद आरिफ जी सादर अभिवादन। बढिया अतुकांत लिखा आपने। बहुत बहुत बधाई इस प्रस्तुति पर। सादर

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on February 22, 2018 at 1:46pm

मुहतरम जनाब आरिफ़ साहिब आदाब, होली से पहले होलीकी याद दिलाती सुन्दर कविता हुईहै ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमायें।

Comment by Mohammed Arif on February 22, 2018 at 8:21am

बहुत-बहुत आभार आदरणीय बृजेश कुमार जी ।

Comment by Mohammed Arif on February 22, 2018 at 8:20am

बहुत-बहुत शुक्रिया आली जनाब मोहतरम समर कबीर साहब । संशोधन कर लिया है ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 21, 2018 at 3:56pm

बहुत सुन्दर कविता रची है आदरणीय...

Comment by Samar kabeer on February 20, 2018 at 6:13pm

जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहिब आदाब,फागुन का स्वागत करती बहतरीन कविता लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

अंतिम से ऊपर वाली पंक्ति में 'होगी' को "होंगीं" कर लें।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"दोहा एकादश. . . . . दिल दिल से दिल की कीजिये, दिल वाली वो बात । बीत न जाए व्यर्थ के, संवादों में…"
1 hour ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"गजल*****करता है कौन दिल से भला दिल की बात अबबनती कहाँ है दिल की दवा दिल की बात अब।१।*इक दौर वो…"
9 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"सादर अभिवादन।"
10 hours ago
Admin replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"स्वागतम"
15 hours ago
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post ग़ज़ल
"  आदरणीय रवि भसीन 'शाहिद' जी सादर नमस्कार, रास्तो पर तीरगी...ये वही रास्ते हैं जिन…"
yesterday
Admin added a discussion to the group चित्र से काव्य तक
Thumbnail

'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176

आदरणीय काव्य-रसिको !सादर अभिवादन !!  ’चित्र से काव्य तक’ छन्दोत्सव का यह एक सौ…See More
Tuesday
Admin posted a discussion

"ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183

आदरणीय साहित्य प्रेमियो, जैसाकि आप सभी को ज्ञात ही है, महा-उत्सव आयोजन दरअसल रचनाकारों, विशेषकर…See More
Tuesday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। संयोग शृंगार पर सुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
Tuesday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार

 अभिसारों के वेग में, बंध हुए निर्बंध । मौन सभी खंडित हुए, शेष रही मधुगंध ।। प्रेम लोक की कल्पना,…See More
Sunday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२ ****** घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये उघड़े  शरीर  आप  ही  सम्मान  हो गये।१। *…See More
Feb 7
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Feb 6
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"क्षमा कीजियेगा 'मुसाफ़िर' जी "
Feb 5

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service