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फागुन
अलसाई हुई भोर को
फागुनी दस्तक की
गंध ने महका दिया
मेरे अंदर भी
बीज अंकुरित होने लगे
तुम्हारे अहसासों के
शायद तुम भी
गुनगुना रही होगी
होली का गीत
प्रेम की मादल पर
कुछ पुरानी यादें भी
थाप दे रही होंगी
हृदय के आँगन में
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

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Comment

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Comment by Mohammed Arif on February 23, 2018 at 8:38am

रचना पर उपस्थिति और सराहना के लिए बहुत-बहुत आभार आदरणीया रक्षिता सिंह जी । आपकी टिप्पणी से लेखन सार्थक हो गया ।

Comment by Rakshita Singh on February 23, 2018 at 8:18am

आदरणीय आरिफ जी, नमस्कार

बहुत ही सुन्दर पंक्तियाँ, हार्दिक बधाई स्वीकार करें।

Comment by Mohammed Arif on February 22, 2018 at 3:59pm

दिली आभार आदरणीय सुरेंद्रनाथ जी । 

Comment by Mohammed Arif on February 22, 2018 at 3:57pm

बहुत-बहुत दिली शुक्रिया आदरणीय तस्दीक़ अहमद जी । लेखन सार्थक हुआ ।

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on February 22, 2018 at 3:02pm

आद0 मोहम्मद आरिफ जी सादर अभिवादन। बढिया अतुकांत लिखा आपने। बहुत बहुत बधाई इस प्रस्तुति पर। सादर

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on February 22, 2018 at 1:46pm

मुहतरम जनाब आरिफ़ साहिब आदाब, होली से पहले होलीकी याद दिलाती सुन्दर कविता हुईहै ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमायें।

Comment by Mohammed Arif on February 22, 2018 at 8:21am

बहुत-बहुत आभार आदरणीय बृजेश कुमार जी ।

Comment by Mohammed Arif on February 22, 2018 at 8:20am

बहुत-बहुत शुक्रिया आली जनाब मोहतरम समर कबीर साहब । संशोधन कर लिया है ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 21, 2018 at 3:56pm

बहुत सुन्दर कविता रची है आदरणीय...

Comment by Samar kabeer on February 20, 2018 at 6:13pm

जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहिब आदाब,फागुन का स्वागत करती बहतरीन कविता लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

अंतिम से ऊपर वाली पंक्ति में 'होगी' को "होंगीं" कर लें।

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