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ग़ज़ल...तू खुश्बू है चन्दन है-बृजेश कुमार 'ब्रज'

22 22 22 2
खन खन करता कंगन है
साँसों में भी कम्पन है

मैं पत्थर हूँ राहों का
तू खुश्बू है चन्दन है

आहट है किन कदमों की
उर में कैसा स्पंदन है

आँखों ने क्या कह डाला
आकुल ये मन वंदन है

मन मन्दिर में आ जाओ
स्वागत है अभिनन्दन है
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

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Comment

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 21, 2018 at 6:06pm

आदरणीय धामी जी हार्दिक आभार स्नेह बनाये रखें..सादर

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 21, 2018 at 6:05pm

आदरणीय सुरेद्र जी बहुत बहुत आभार..सादर

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 21, 2018 at 3:35pm

आ. भाई ब्रजेश जी, सुंदर गजल हुई है हार्दिक बधाई ।

Comment by नाथ सोनांचली on March 20, 2018 at 11:06pm

आद0 बृजेश जी सादर अभिवादन। बढिया ग़ज़ल कही आपने। बधाई कुबूल कीजिये

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 19, 2018 at 9:24pm

हार्दिक आभार आदरणीय तस्दीक़ जी...

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 19, 2018 at 9:23pm

स्वागत है अभिनन्दन है आदरणीय शर्मा जी..

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 19, 2018 at 9:23pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय विजय जी..

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on March 19, 2018 at 7:37pm

जनाब ब्रजेश कुमार साहिब ,सुन्दर ग़ज़ल हुई है ,मुबारक बाद क़ुबूल फरमायें।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on March 19, 2018 at 1:10pm

वाह मुग्ध हूँ पढ़कर, क्या कहने 

Comment by vijay nikore on March 19, 2018 at 12:02pm

गज़ल अच्छी लिखी है। बधाई।

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