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धूप का विस्तार लगाकर सो गए - सलीम रज़ा रीवा

2122 2122 212

धूप का विस्तार लगाकर सो गए

छांव सिरहाने दबाकर सो गए

oo

ज़िंदगी से थक-थका कर सो गए

वो चराग़--जाँ बुझा कर सो गए

oo

गुफ़्तगू की दिल मे ख़्वाहिश थी मगर

वो मेरे ख़्वाबों में आकर  सो गए

oo

तंग थी चादर तो हमने यूँ किया

पांव सीने से लगाकर सो गए

oo

उनकी नींदों पर निछावर मेरे ख़ाब

जो ज़माने को जगाकर सो गए

oo

बे-कसी में और क्या करते 'रज़ा

ख़ुद को ही समझा-बुझा कर सो गए
________________________
मौलिक व अप्रकाशित

बहरे रमल मुसद्दस महज़ूफ़

Views: 1130

Comment

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Comment by SALIM RAZA REWA on March 19, 2018 at 9:48pm
आदरणीय बसंत कुमार जी,
ग़ज़ल पर आपकी शिरक़त के लिए शुक्रिया.
Comment by SALIM RAZA REWA on March 19, 2018 at 9:46pm
जनाब तस्दीक साहब,
ग़ज़ल पर आपकी शिरक़त और मशविरे के लिए शुक्रिया,
Comment by SALIM RAZA REWA on March 19, 2018 at 9:44pm
आ. नीलेश भाई,
आप अपने विद्यार्थियों को सिखाने के लिए दूसरे की ग़ज़ल का इंतख़ाब करें...
Comment by Nilesh Shevgaonkar on March 19, 2018 at 8:44pm

आ. सलीम साहब,
आप क्या चाहते हैं   या क्या नहीं चाहते  यह न मेरे लिए मायने रखता है न मंच के लिए...
जो बात मायने रखती    है वो यह है कि नये सीखने वाले इस मंच से लाभान्वित हों इसीलिए आपस में एक दूसरे की रचनाओं की समीक्षा करने की व्यवस्था है ...
आप को आपका लिखा सही लगता है तो उससे भी   फर्क नहीं पड़ता ... लेकिन कोई उभरता हुआ शाइर गलत न सीख ले इस मंच से इसका ध्यान रखना मेरा कर्तव्य भी है और अधिकार भी ...
बाकी रचना आपकी है ..जैसी मर्ज़ी वैसी कहें ...

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on March 19, 2018 at 6:43pm

जनाब सलीम रज़ा साहिब ,बहुत ही मुरस्सा औऱ उम्दा ग़ज़ल हुई है ।मुबारक बाद क़ुबूल फरमाएं। मतले में विस्तार को बिस्तर  कर लीजिये । शेर 4 और 7 में तकाबुले  रदीफैंन की तकरार हो रही है ,मुनासिब समझें तो उला मिसरा यूँ कर सकते हैं । "मुश्किलों से हम लड़े ता ज़िन्दगी "। "दीप यादों के रहे रोशन फ़क़त"  । ---सादर

 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on March 19, 2018 at 1:09pm

बहुत बढ़िया गजल, वाह वाह, बहुत बहुत बधाई आपको 

Comment by SALIM RAZA REWA on March 19, 2018 at 11:05am
आदरणीय नीलेश साहिब,
ग़ज़ल पर आपकी शिरक़त और मशविरे के लिए शुक्रिया,
टाइपिंग सुधार लिया जाएगा,,
क़ाफ़िया आकर ' है और यह पूर्णतः सही व दोषमुक्त है,
..... नोट
हम इस बारे में कोई बहस नहीं चाहते...
धन्यवाद......
Comment by SALIM RAZA REWA on March 19, 2018 at 11:00am
जनाब शेख उस्मानी साहिब,
आपकी महब्बत के लिए शुक्रिया,
Comment by Nilesh Shevgaonkar on March 19, 2018 at 8:17am

आ. सलीम साहब 
.
धूप का विस्तार लगाकर सो गए ... बिस्तर की जगह विस्तार टाइप हो गया है जिसे ठीक कर लें ..
यहाँ मतले में लगाकर और दबाकर योजित काफ़िये हैं जिनके मूल शब्द लग और दब हैं...जिन में राइम नहीं है  जिसके चलते दोष उत्पन्न हो रहा है..
शेष ग़ज़ल के लिए बधाई 
सादर 

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on March 19, 2018 at 6:04am

कड़वे सच बयां करते अशआर के साथ बेहतरीन ग़ज़ल के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत मुबारकबाद मुहतरम जनाब सलीम रज़ा ' रीवा' साहिब।

कृपया ध्यान दे...

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