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फ़ाइलातुन फ़इलातुन फ़इलातुन फेलुन/फ़इलुन

इसलिये आने से कतराते हैं ईमाँ वाले

तेरे कूचे में उधम करते हैं शैताँ वाले

.

ये किसी ख़तरे की आमद का इशारा तो नहीं

ख़्वाब क्यों मुझको दिखाता है वो तूफ़ाँ वाले

.

और सब कुछ यहाँ तब्दील हुआ है लेकिन

घर में दस्तूर हैं अब तक वही अम्माँ वाले

.

बाग़बाँ ने वो सितम तोड़े हैं इनपर देखो

कितने सहमे हुए रहते हैं गुलिस्ताँ वाले

.

रह्म करना किसी बिस्मिल पे गवारा ही नहीं

कितने सफ़्फ़ाक हैं देखो ये परिस्ताँ वाले

.

काँप जाता है ये दिल,रूह लरज़ जाती है

याद आते हैं सफ़र जब वो बयाबाँ वाले

.

मेरे जज़्बात वही शख़्स समझ सकता है

जिसने अफ़साने सुने होंगे दिल-ओ-जाँ वाले

.

याद जब घर की सताए तो,रिहाई के लिये

आसमाँ सर पे उठा लेते हैं ज़िनदाँ वाले

.

अपने मज़हब की किताबों से गुरेज़ां हैं सब

गीता वाले हों "समर"या कि हों क़ुरआँ वाले

------

आमद-आना

बिस्मिल-ज़ख़्मी

जिन्दां-;क़ैद ख़ाना

गुरेज़ां-भागने वाले

"समर कबीर"

मौलिक/अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Samar kabeer on April 17, 2018 at 10:08pm

जनाब नवीन मणि जी आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिए बहुत बहुत शुक्रिया आपका ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on April 17, 2018 at 9:54pm

वाह सर वाह । आपकी ग़ज़लें तो बहुत ही अच्छी होती हैं । आपको पढ़कर नए मफ़हूम मिलते हैं । 

     बहुत ही प्रभवशाली प्रस्तुति है । तहे दिल से बधाई ।।

Comment by Samar kabeer on April 9, 2018 at 6:23pm

जनाब अजय तिवारी साहिब आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।

Comment by Ajay Tiwari on April 9, 2018 at 6:03pm

आदरणीय समर साहब,  उम्दा ग़ज़ल हुई है.हार्दिक बधाई.

Comment by Samar kabeer on April 9, 2018 at 11:03am

जनाब लक्ष्मण धामी जी आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।

Comment by Samar kabeer on April 9, 2018 at 11:01am

जनाब सुरेन्द्र नाथ सिंह जी आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 9, 2018 at 5:36am

आ. भाई समर जी, सुंदर गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by नाथ सोनांचली on April 9, 2018 at 4:45am

आद0 आली जनाब समर साहब सादर प्रणाम। आपके जानिब से एक बेहतरीन ग़ज़ल पढ़ने को मिली। वाह क्या कहने। वैसे तो सभी शैर लाजबाब, पर कुछ बेहद खास लगे।

मेरे जज़्बात वही शख़्स समझ सकता है

जिसने अफ़साने सुने होंगे दिल-ओ-जाँ वाले

वाह क्या कहन है।

अपने मज़हब की किताबों से गुरेज़ां हैं सब

गीता वाले हों "समर"या कि हों क़ुरआँ वाले

बाकमाल कथ्य।

और सब कुछ यहाँ तब्दील हुआ है लेकिन

घर में दस्तूर हैं अब तक वही अम्माँ वाले

बेजोड़ शैर दिल को छूता हुआ

शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ

Comment by Samar kabeer on April 8, 2018 at 9:36pm

जनाब बृजेश कुमार 'ब्रज' जी आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 8, 2018 at 9:30pm

बहुत ही बेहतरीन ग़ज़ल कही है आदरणीय..मक़्ता तो लाजबाब है..सादर

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