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ग़ज़ल...परेशां रहा हूँ मैं अहल-ए-सितम से-बृजेश कुमार 'ब्रज'

122 122 122 122
गम-ए-दिल उठाऊँ,अज़ीमत नहीं है
मगर बच निकलने की सूरत नहीं है

सुनो बख़्श दो मुझको वादों वफ़ा से
यहाँ अब किसी की जरुरत नहीं है

परेशां रहा हूँ मैं अहल-ए-सितम से
तुम्हारी भी क़ुर्बत की नीयत नहीं है

ओ महताब तू है तो ग़ज़लें हैं रौशन
वगरना सुख़नवर की अज़्मत नहीं है

सरेआम  'ब्रज' की ग़ज़ल गुनगुनाना
ये है और क्या गर मुहब्बत नहीं है

अज़ीमत-इरादा
अहल-ए-सितम-तानाशाह
क़ुर्बत-नजदीकियां
महताब-चन्दा
सुख़नवर-लेखक
अज़्मत-इज्जत
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 12, 2018 at 10:05am

तहेदिल से शुक्रिया ज़नाब तस्दीक़ जी..

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 12, 2018 at 10:04am

स्वागत संग आभार आभार आदरणीय लक्ष्मण धामी जी..सादर

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 12, 2018 at 10:03am

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय विजय जी..सादर

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on April 11, 2018 at 7:19pm

जनाब ब्रजेश कुमार साहिब ,अच्छी ग़ज़ल हुई है ,मुबारक बाद क़ुबूल फरमायें।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 11, 2018 at 3:30pm

आ. भाई ब्रजेश जी, अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by vijay nikore on April 11, 2018 at 11:52am

अच्छी गज़ल कही है। आपको हार्दिक बेधाई, आदरणीय बृजेश जी।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 10, 2018 at 5:56pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय श्याम नारायण वर्मा जी...

Comment by Shyam Narain Verma on April 10, 2018 at 10:54am
बहुत खूबसूरत अशआर ...दिल से बधाई 
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 9, 2018 at 8:48pm

आदरणीय तिवारी जी बहुत बहुत धन्यवाद...

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 9, 2018 at 8:48pm

आदरणीय डा.साहब हार्दिक आभार..

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