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'ग़ज़ल कहने जो बैठोगे तो नानी याद आएगी'

(चौथे शैर में तक़ाबल-ए-रदीफ़ नज़र अंदाज़ करे)

नसीहत जो बुज़ुर्गों की न मानी याद आएगी

हमें ता उम्र उनकी सरगरानी याद आएगी

मियाँ मश्क़-ए-सुख़न कर लो नहीं ये खेल बच्चों का

ग़ज़ल कहने जो बैठोगे तो नानी याद आएगी

ज़माने भर की आसाइश के जब सामाँ बहम होंगे

तुझे माँ-बाप की क्या जाँ फ़िशानी याद आएगी

जुड़ी होंगी मज़ालिम की बहुत सी दास्तानें भी

हवेली गाँव की जब ख़ानदानी याद आएगी

क़वाफ़ी जब भी आएँगे ग़ज़ल में ज़िन्दगानी के

मुझे तब "नूर"की वो 'कूड़ेदानी' याद आएगी

----

सरगरानी--नाराज़गी

मश्क़-ए-सुख़न--ग़ज़ल अभ्यास

आसाइश--आराम

जाँ फ़िशानी--मिहनत

मज़ालिम--अत्याचार

"नूर"--निलेश 'नूर'

---

'समर कबीर'

मौलिक/अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Samar kabeer on May 10, 2018 at 6:05pm

बहना राजेश कुमारी जी आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।

'कूड़े दानी' के विषय में निलेश जी बताएंगे तो बहतर होगा बहना, हा हा हा..


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Comment by rajesh kumari on May 10, 2018 at 5:47pm

नसीहत जो बुज़ुर्गों की न मानी याद आएगी

हमें ता उम्र उनकी सरगरानी याद आएगी----वाह्ह्ह कमाल का शेर 

क़वाफ़ी जब भी आएँगे ग़ज़ल में ज़िन्दगानी के

मुझे तब "नूर"की वो 'कूड़ेदानी' याद आएगी---हाहाहा .....वैसे ये नीलेश की कूड़े दानी की क्या कहानी है हमें भी पाता चले भाई जी 

----बहुत बहुत बधाई दाद ग़ज़ल के लिए 

Comment by Samar kabeer on May 10, 2018 at 2:22pm

भाई,मेरे हिसाब से मिसरा बिलकुल साफ़ है,'नसीहत जो बुज़ुर्गों की न मानी याद आएगी'यानी हमने जो नसीहत बुज़ुर्गों की नहीं मानी याद आएगी,कि हमसे ये ग़लती हुई ।

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on May 10, 2018 at 1:13pm

मुहतरम जनाब समर साहिब , मफ़हूम साफ़ है मगर क़ाफ़िए का रदीफसे रब्त नहीं बैठ रहा है। "नसीहत जो बुज़ुर्गों की न मानी याद आएगी" या "न मानी जो बुज़ुर्गों की नसीहत याद आएगी " । सादर

Comment by Samar kabeer on May 10, 2018 at 10:32am

जनाब तस्दीक़ अहमद साहिब आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।

मतले के ऊला मिसरे का मफ़हूम बिल्कुल साफ़ है ।

Comment by Samar kabeer on May 10, 2018 at 10:28am

जनाब भाई विजय निकोर जी आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on May 9, 2018 at 9:31pm
  • मुहतरम जनाब समर साहिब आदाब , बहुत ही उम्दा ग़ज़ल हुई है ,मुबारक बाद क़ुबूल फरमायें। मतले के उला मिसरे का मफ़हूम साफ़ नहीं लग रहा है , "मानी याद आएगी " क़ाफिये का मेल रदीफ़ से , देखियेगा। ---सादर
Comment by vijay nikore on May 9, 2018 at 8:37pm

गज़ल पढ़ कर बहुत लुत्फ़ आया। लगता है, आप किसी भी बात पर खूबसूरत गज़ल लिख सकते हैं।दिल से मुबारक आपको, भाई समर जी।

Comment by Samar kabeer on May 9, 2018 at 4:57pm

जनाब राम शिरोमणि जी आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिए बहुत बहुत शुक्रिया ।

Comment by ram shiromani pathak on May 9, 2018 at 4:38pm

बहुत ही सुंदर आदरणीय।।बधाई

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