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बोलती निगाहें (लघुकथा)

"बिटिया, कितनी बार कहा है कि अॉनलाइन शॉपिंग वग़ैरह के अॉफरों और प्रलोभनों में अपना समय और पैसा यूं मत ख़र्च करो!" अशासकीय शिक्षक ने अपनी कमाऊ शादी योग्य बेटी से कहा ही था कि उनकी पत्नी बीच में टपकीं और बोलीं- "तुम अपने काम से काम रखो। बिटिया तुम से ज़्यादा कमा कर अपने दम पर अपना दहेज़ जोड़ रही है और पैसे भी! ... और रिश्ता भी!"

"आप लोग यूं परेशान न हों! ...मम्मी तुम्हें पापा से इस तरह नहीं बोलना चाहिए। मुझे पता है प्राइवेट नौकरी में क्या-क्या और कैसे सब कर पाते हैं!" बिटिया ने अपना स्मार्ट फोन अॉफ़ करते हुए कहा- "मुझे पता है कि पापा बहुत क़ाबिल और आदर्शवादी होते हुए भी आज के ज़माने और नेट-बैंकिंग वग़ैरह से कैसे तालमेल बिठा पा रहे हैं घर-गृहस्थी के साथ!"


बिटिया के मम्मी-पापा आशा भरी निगाहों से अपनी बिटिया की ओर देखने लगे।


(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Neelam Upadhyaya on May 23, 2018 at 4:55pm

आदरणीय उस्मानी जी, नमस्कार।  आज के समय से सामंजस्य बिठाती अच्छी लघु कथा।  बधाई स्वीकार करें।

Comment by babitagupta on May 21, 2018 at 7:59pm

आदरणीय सर जी. आज के बच्चों और माता पिता के आपसी सोच मे सामंजस्य दर्शाती बहुत ही अच्छी लघु कथा है । प्रकाशित रचना के लिए बधाई स्वीकार कीजिएगा ।

Comment by Mohammed Arif on May 21, 2018 at 12:27pm

आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी जी आदाब,

                                    अत्यंत सामयिक-प्रासंगिक लघुकथा । कथा में जीवंतता भी है । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on May 20, 2018 at 7:02pm

ठीक ठाक ही लगी यह लघुकथा आपकी आदरणीय शहजाद उस्मानी जी | सादर|

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on May 20, 2018 at 12:47pm

जनाब शहज़ाद उस्मानी साहिब आ दाब , समाज को आइना दिखाती उम्दा लघुकथा हुई है मुबारकबाद क़ुबुल फरमाएं |

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