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उसने बिखरे काग़ज़ों को .....संतोष

फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फाइलुन

उसने बिखरे काग़ज़ों को छू के संदल कर दिया

इक अधूरी सी ग़ज़ल को यूँ मुकम्मल कर दिया

कुछ तो दीवाना था मैं पहले ही उसके इश्क़ में

उसने चिल्मन यूँ हटाई मुझको पागल कर दिया

उसके जलवों का करिश्मा था कि जिसने दोस्तो

सारी दुनिया को मेरी आँखों से ओझल कर दिया

मैं बहुत उलझा हुआ था ज़िन्दगी के फेर में

तूने मेरी जान लेकर मसअला हल कर दिया

उसने यूँ डाली इनायत की नज़र 'संतोष' पर

छीन कर हर इक ख़ुशी ग़म को मुसलसल कर दिया

#संतोष_खिरवड़कर

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by santosh khirwadkar on July 1, 2018 at 11:26am

घन्यवाद आ.बृजेश जी ....

Comment by santosh khirwadkar on July 1, 2018 at 11:24am

आभार आ.श्याम जी ..

Comment by gumnaam pithoragarhi on July 1, 2018 at 10:01am

खूबसूरत ग़ज़ल के लिए बधाई,

Comment by Mohammed Arif on June 30, 2018 at 5:35pm

आदरणीय संतोष जी आदाब,

                    बहुत ही बेहतरीन इश्क़ के रंग में डूबी ग़ज़ल । दिली मुबारकबाद क़ुबूल करें ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 30, 2018 at 1:41pm

वाह बड़ी अच्छी ग़ज़ल कही है...

Comment by Shyam Narain Verma on June 30, 2018 at 11:40am
बहुत बहुत बधाई आपको इस खूबसूरत ग़ज़ल के लिए सादर ।
Comment by santosh khirwadkar on June 30, 2018 at 11:03am

प्रणाम सर, तहेदिल से शुक्रिया!!

Comment by Samar kabeer on June 30, 2018 at 10:32am

जनाब संतोष जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

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